Vigyan Vardan Ya Abhishap Par Nibandh

विज्ञान : वरदान या अभिशाप पर 

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” वास्तव में विज्ञान ने जितनी समस्याएँ हल की हैं , उतनी ही नई समस्याएँ खड़ी भी कर दी हैं । ” – श्रीमती इन्दिरा गांधी 

जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान – अटल बिहारी बाजपाई  

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Vigyan Vardan Ya Abhishap Par Nibandh की  रूपरेखा 

  1. प्रस्तावना
  2. विज्ञान : वरदान के रूप में
  3. विज्ञान : एक अभिशाप के रूप में
  4. विज्ञान : वरदान या अभिशाप ?
  5. उपसंहार

1- प्रस्तावना 

यद्यपि इस पृथ्वी पर मनुष्य को उत्पन्न हुए लाखों वर्ष व्यतीत हो चुके हैं , किन्तु वास्तविक वैज्ञानिक उन्नति पिछले दो – सौ वर्षों में ही हुई है ।

साहित्य में विमानों और दिव्यास्त्रों के कवित्वमय उल्लेख के अतिरिक्त कोई ऐसे प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं , जिनके आधार पर यह सिद्ध हो सके कि प्राचीनकाल में इस प्रकार की वैज्ञानिक उन्नति हुई थी ।

एक समय था , जब मनुष्य सष्टि की प्रत्येक वस्तु को कौतुहलपूर्ण व आश्चर्यजनक समझता था तथा उनसे भयभीत होकर ईश्वर की प्रार्थना करता था, किन्त आज विज्ञान ने प्रकृति को वश में करके उसे मानव की दासी बना दिया है ।

आधुनिक युग में विज्ञान के नवीन आविष्कारों ने विश्व में क्रान्ति – सी उत्पन्न कर दी है । विज्ञान के बिना मनुष्य के स्वतन्त्र अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती । विज्ञान की सहायता से मनुष्य प्रकृति पर निरन्तर विजय प्राप्त करता जा रहा है ।

आज से कुछ वर्ष पूर्व विज्ञान के आविष्कारों की चर्चा से ही लोग आश्चर्यचकित हो जाया करते थे ; परन्तु आज वही आविष्कार मनुष्य के जीवन में पूर्णतया घुल – मिल गए हैं । विज्ञान ने हमें अनेक सुख – सुविधाएँ प्रदान की हैं ; किन्तु साथ ही विनाश के विविध साधन भी जुटा दिए हैं।

इस स्थिति में यह प्रश्न विचारणीय हो गया है कि विज्ञान मानव कल्याण के लिए कितना उपयोगी है ? वह समाज के लिए वरदान है या अभिशाप ?

2- विज्ञान : वरदान के रूप में

वरदान के रूप में आधुनिक विज्ञान ने मानव – सेवा के लिए अनेक प्रकार के साधन जुटा दिए हैं । पुरानी कहानियों में वर्णित अलादीन के चिराग का दैत्य जो काम करता था , उन्हें विज्ञान बड़ी सरलता से कर देता है ।

रातो – रात महल बनाकर खड़ा कर देना , आकाश – मार्ग से उड़कर दूसरे स्थान पर चले जाना , शत्रु के नगरों को मिनटों में बरबाद कर देना आदि विज्ञान के द्वारा सम्भव किए गए ऐसे ही कार्य हैं । विज्ञान मानव – जीवन के लिए वरदान सिद्ध हआ है ।

उसकी वरदायिनी शक्ति ने मानव को अपरिमित सुख – समृद्धि प्रदान की है ; यथा

( क ) परिवहन के क्षेत्र में- पहले लम्बी यात्राएँ दुरूह स्वप्न – सी लगती थीं , किन्तु आज रेल , मोटर और वायुयानों ने लम्बी यात्राओं को अत्यन्त सुगम व सुलभ कर दिया है । पृथ्वी पर ही नहीं, आज के वैज्ञानिक साधनों के द्वारा मनुष्य ने चन्द्रमा पर भी अपने कदमों के निशान बना दिए हैं ।

( ख ) संचार के क्षेत्र में – टेलीफोन , टेलीग्राम , टेलीप्रिण्टर , टैलेक्स , फैक्स , ई – मेल आदि के द्वारा क्षणभर में एक स्थान से दूसरे स्थान को सन्देश पहुँचाए जा सकते हैं । रेडियो और टेलीविजन द्वारा कुछ ही क्षणों में किसी समाचार को विश्व भर में प्रसारित किया जा सकता है ।

( ग ) चिकित्सा के क्षेत्र में- चिकित्सा के क्षेत्र में तो विज्ञान वास्तव में वरदान सिद्ध हुआ है । आधुनिक चिकित्सा – पद्धति इतनी विकसित हो गई है कि अन्धे को आँखें और विकलांगों को अंग मिलना अब असम्भव नहीं है । कैसर , टी०बी० , हृदयरोग जैसे भयंकर और प्राणघातक रोगों पर विजय पाना विज्ञान के माध्यम से ही सम्भव हो सका है ।

( घ ) खाद्यान्न के क्षेत्र में- आज हम अन्न उत्पादन एवं उसके संरक्षण के मामले में आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं । इसका श्रेय आधुनिक विज्ञान को ही है। विभिन्न प्रकार के उर्वरकों, कीटनाशक दवाओं, खेती के आधुनिक साधनों तथा सिंचाई सम्बन्धी कृत्रिम व्यवस्था ने खेती को अत्यन्त सरल व लाभदायक बना दिया है ।

( ङ ) उद्योगों के क्षेत्र में- उद्योगों के क्षेत्र में विज्ञान ने क्रान्तिकारी परिवर्तन किए हैं । विभिन्न प्रकार मशीनों ने उत्पादन की मात्रा में कई गुना वृद्धि की है । ।

( च ) दैनिक जीवन में- हमारे दैनिक जीवन का प्रत्येक कार्य अब विज्ञान पर ही आधारित है । विद्युत् हमार जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग बन गई है । बिजली के पंखे, LPG गैस, स्टोव, फ्रिज आदि के निर्माण ने सुविधापूर्ण जीवन का वरदान दिया है।

इन आविष्कारों से समय, शक्ति और धन की पर्याप्त बचत हुई है । विज्ञान ने हमारे जीवन को इतना अधिक परिवर्तित कर दिया है कि यदि दो – सौ वर्ष पूर्व का कोई व्यक्ति हम देखे तो वह यही समझेगा कि हम स्वर्ग में रह रहे हैं ।

यह कहने में कोई अतिशयोक्ति न होगी कि भविष्य का विज्ञान मृत व्यक्ति को भी जीवन दे सकेगा । इसलिए विज्ञान को वरदान न कहा जाए तो और क्या कहा जाए ?

3- विज्ञान : एक अभिशाप के रूप में

एक अभिशाप के रूप में विज्ञान का एक दूसरा पहलू भी है । विज्ञान ने मनुष्य के हाथ में बहुत अधिक शक्ति दे दी है , किन्तु उसके प्रयोग पर कोई बन्धन नहीं लगाया है।

स्वार्थी मानव इस शक्ति का प्रयोग जितना रचनात्मक कार्यों के लिए कर रहा है , उससे अधिक प्रयोग विनाशकारी कार्यों के लिए भी कर रहा है । सुविधा प्रदान करने वाले उपकरणों ने मनुष्य को आलसी बना दिया है।

यन्त्रों के अत्यधिक उपयोग ने देश में बेरोजगारी को जन्म दिया है। परमाणु – अस्त्रों के परीक्षणों ने मानव को भयाक्रान्त कर दिया है।

जापान के नागासाकी और हिरोशिमा नगरों का विनाश विज्ञान की ही देन माना गया है । मनुष्य अपनी पुरानी परम्पराएँ और आस्थाएँ भूलकर भौतिकवादी होता जा रहा है ।

भौतिकता को अत्यधिक पहत्त्व देने के कारण उसमें विश्वबन्धुत्व की भावना लुप्त होती जा रही है । परमाणु तथा हाइड्रोजन बम निःसन्देह विश्व – शान्ति के लिए खतरा बन गए हैं । इनके प्रयोग से किसी भी क्षण सम्पूर्ण विश्व तथा विश्व – संस्कृति का विनाश पल भर में ही सम्भव है ।

4. विज्ञान : वरदान या अभिशाप ?

यह प्रश्न भी बहुत स्वाभाविक है कि क्या कम्प्यूटर और मानव – मस्तिष्क का तुलना की जा सकती है और इनमें कौन श्रेष्ठ है ; क्योंकि कम्प्यूटर के मस्तिष्क का निर्माण भी मानव – बुद्धि के पर ही सम्भव हुआ है ।

यह बात नितान्त सत्य है कि मानव मस्तिष्क की अपेक्षा कम्प्यूटर समस्याओं को बहुत हल कर सकता है, किन्तू  वह मानवीय संवेदनाओं , अभिरुचियों , भावनाओं और चित्त से रहित मात्र एक यन्त्र – पुरुष है ।

कम्प्यूटर केवल वही काम कर सकता है । जिसके लिए उसे निर्देशित ( programmed ) किया गया हो । वह कोई निर्णय स्वयं नहीं ले सकता और न ही कोई नवीन बात सोच सकता है ।

7- उपसंहार :

विज्ञान का वास्तविक लक्ष्य है – मानव – हित और मानव – कल्याण । यदि विज्ञान अपने इस उद्देश्य की दिशा में पिछड़ जाता है तो विज्ञान को त्याग देना ही हितकर होगा ।

राष्ट्रकवि रामधारीसिंह ‘ दिनकर ‘ ने अपनी इस धारणा को इन शब्दों में व्यक्त किया है

“सावधान , मनुष्य , यदि विज्ञान है तलवार ,

तो इसे दे फेंक , तजकर मोह, स्मृति के पार।

हो चुका है सिद्ध , है तू शिशु अभी अज्ञान,

फूल – काँटों की तुझे कुछ भी नहीं पहचान।

खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार,

काट लेगा अंग, तीखी है बड़ी यह धार।

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