विज्ञान की उपलब्धियाँ | विज्ञान : एक वरदान

विज्ञान की उपलब्धियाँ | विज्ञान : एक वरदान

Vigyan Ke Chamatkar Par Nibandh

विज्ञान की उपलब्धियाँ

ये vigyan ke chamatkar par nibandh विभिन्न बोर्ड जैसे UP Board, Bihar Board और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को दृश्टिगत रखते हुए लिखा गया है, अगर आपके मन  सवाल हो तो comment लिख कर पूछ सकते हैं |

इस शीर्षक से मिलते-जुलते अन्य सम्बंधित शीर्षक –

  • विज्ञान के लाभ
  • विज्ञान की उपयोगिता
  •  विज्ञान के चमत्कार ( 2000 )
  • वर्तमान जीवन में विज्ञान
  • विज्ञान के सान
  • विज्ञान के बढ़ते चरण ( 2000 )
  • विज्ञान : एक वरदान
  • भारत में वैज्ञानिक प्रगति ( 2000 )

“विज्ञान सामाजिक परिवर्तन का एक महान् उपकरण है – आधुनिक सभ्यता के विकास में सहयोगी सभी क्रांतियों में सबसे अधिक शक्तिशाली । ”  – आर्थरबाल्फोर 

विज्ञान : एक वरदान की  रूपरेखा 

  1. प्रस्तावना
  2. विविध क्षेत्रों में विज्ञान के चमत्कार
  3. विज्ञान के चमत्कारों से लाभ एवं हानि
  4. विज्ञान और मनुष्य का सम्बन्ध
  5. उपसंहार

1- प्रस्तावना 

विज्ञान का अर्थ है विशेष या विश्लेषित ज्ञान और इन्हीं विशेष ज्ञान के फलस्वरूप आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों से विश्व में अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन हो रहा है । विज्ञान सम्पूर्ण मानव – जीवन पर छा गया है ।

मानव की सहज भावनाएँ प्रायः लुप्त होती जा रही हैं । यहाँ तक कि विज्ञान के बिना मनुष्य के स्वतन्त्र अस्तित्व की कल्पना करना भी सम्भव नहीं रह गया है। विज्ञान की सहायता से मनुष्य प्रकृति पर विजय प्राप्त करता जा रहा है ।

आज से कुछ वर्षों पहले वैज्ञानिक आविष्कारों की चर्चा से ही लोग आश्चर्यचकित हो जाया करते थे , परन्तु आज वही आविष्कार मनुष्य के दैनिक जीवन में घुल – मिल गए है ।

एक समय था जब मनुष्य इस सृष्टि की प्रत्येक वस्तु को कौतुहल से भरी हई एवं आश्चर्यजनक समझता था तथा उनस भयभीत होकर ईश्वर की प्रार्थना किया करता था , परन्तु आज विज्ञान ने प्रकृति को वश में करके उसे मानव का दासी बना दिया है ।

2- विविध क्षेत्रों में विज्ञान के चमत्कार

विज्ञान मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है । वह विश्व के संचालन का मुल आधार हैं । विज्ञान की असीमित शक्ति का पता उसके चमत्कारपूर्ण आविष्कारों से लगता है ।

इसके चामत्कारिक आविष्कारों का सहारा लेकर मानव ने बड़ी – बड़ी समस्याओं के समाधान खोज निकाले हैं । उसकी वरदायिनी शक्ति मानव को अपरिमित सुख – समृद्धि प्रदान कर रही है ।

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वैज्ञानिक आविष्कारों ने प्रभुत्व स्थापित कर लिया है ; यथा

( क ) संचार के क्षेत्र में प्राचीनकाल में सन्देशों के आदान – प्रदान में बहुत अधिक समय लग जाया करता था ; परन्तु आज समय की दूरी घट गई है । अब फैक्स और ई – मेल द्वारा क्षणभर में ही किसी भी प्रकार के सन्देश एवं विचारों का आदान – प्रदान किया जा सकता है ।

रेडियो और टेलीविजन द्वारा कोई समाचार अब कुछ ही क्षणों में – विश्व भर में प्रसारित किया जा सकता है । आज चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहों से सम्प्रेषित सन्देश पृथ्वी पर पलभर में ही प्राप्त किए जा सकते हैं । विज्ञान ने पृथ्वी और आकाश की दूरी समेट ली है ।

( ख ) यातायात एवं परिवहन के क्षेत्र में पहले व्यक्ति थोड़ी – सी दूरी तय करने में ही पर्याप्त समय लगा देता था । लम्बी यात्राएँ उसे दुरूह स्वप्न – सी लगती थीं ।

आज रेल , मोटर तथा वायुयानों ने लम्बी यात्राएँ अत्यन्त सुगम व सुलभ कर दी हैं । अब विविध वस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुगमतापूर्वक भेजी जा सकती हैं । पृथ्वी ही नहीं , आज इन वैज्ञानिक साधनों के द्वारा मनुष्य ने चन्द्रमा पर भी अपने कदमों के निशान बना दिए हैं ।

( ग ) चिकित्सा के क्षेत्र में – विज्ञान ने मनुष्य के जीवन को समृद्ध किया है । अनेक असाध्य बीमारियों का इलाज विज्ञान द्वारा ही सम्भव हुआ है । आधुनिक चिकित्सा पद्धति इतनी विकसित हो गई है कि नेत्रहीन को आँखें और विकलांग को अंग मिलना अब असम्भव नहीं लगता ।

शल्य चिकित्सा , कृत्रिम श्वास एवं विविध प्रकार की जीवनरक्षक ओषधियों द्वारा अब मनुष्य को नया जीवन प्रदान किया जा सकता है । कैसर , टी०बी० तथा हृदयरोग जैसे भयंकर प्राणघातक रोगों पर विजय पाना भी विज्ञान के माध्यम से ही सम्भव हुआ है । विज्ञान ने चिकित्सा की नवीन पद्धतियों के सहारे मनुष्य को दीर्घजीवी बनाया है ।

( घ ) शिक्षा के क्षेत्र में ज्ञान – के प्रसार एवं प्रचार में विज्ञान ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है । विज्ञान ने शिक्षा के क्षेत्र में अद्भुत कार्य किए हैं । टेलीविजन , रेडियो एवं सिनेमा ने शिक्षा को सरल बना दिया है । छापेखाने तथा अखबारों ने ज्ञान – वृद्धि में सहयोग दिया है । मुद्रण यन्त्रों के आविष्कार ने पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में क्रान्ति उत्पन्न कर दी है ।

( ङ ) कषि के क्षेत्र में-  जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में भारत का दूसरा स्थान है । पहले इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए अन्नपूर्ति करना असम्भव ही प्रतीत होता था , परन्तु आज हम अन्न के मामले में आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं ।

इसका श्रेय आधुनिक विज्ञान को ही है । विभिन्न प्रकार के उर्वरकों , बआई – कटाई के आधुनिक साधनों , कीटनाशक दवाओं तथा सिंचाई के कृत्रिम साधनों ने खेती को अत्यन्त सुविधापूर्ण एवं सरल बना दिया है । अन्न को सुरक्षित रखने के लिए भी अनेक नवीन उपकरणों का आविष्कार किया गया है ।

( च ) मनोरंजन के क्षेत्र में- मनोरंजन के आधुनिक साधन विज्ञान की ही देन हैं । सिनेमा , रेडियो तथा टेलीविजन के आविष्कार ने मानव को उच्चकोटि के सरल एवं सलभ मनोरंजन के साधन प्रदान कर दिए है ।

 ( छ ) दैनिक जीवन में- हमारे दैनिक जीवन का प्रत्येक कार्य विज्ञान पर ही निर्भर हो गया है । विद्युत् हमार जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग बन गई है । बिजली के पंखे, प्रेस, कुकिंग गैस स्टोव, फ्रिज, सिलाई – मशीन आदिक निर्माण ने मानव को सविधापूर्ण जीवन दिया है । इन आविष्कारों से समय . शक्ति व धन की पर्याप्त बचत हुई है ।

 ( ज ) उद्योग के क्षेत्र में- औद्योगिक क्षेत्र में विज्ञान ने क्रान्तिकारी परिवर्तन किए हैं । भांति – भाति का मशीनों ने उत्पादन को बढ़ाया है । विभिन्न प्रकार के वस्त्र, खाद्य पदार्थ एवं दैनिक उपभोग की वस्तुओं के उत्पादन हेतु विज्ञान ने सरलतम साधनों का आविष्कार किया है ।

हमारे देश में अनेक छोटे – बडे कल – कारखानों का संचालन हो रहा है । इस प्रकार विज्ञान ने उद्योगों को प्रगति की ओर अग्रसर कर दिया है ।

( झ ) परमाणु – शक्ति के क्षेत्र में- आधुनिक युग को परमाणु – युग कहा जाता है । जब वैज्ञानिक उपकरणों का विकास नहीं हुआ था तो मनुष्य को छोटे – से – छोटा कार्य करने में भी कठिनाई का अनुभव होता था ।

आज अणुशक्ति द्वारा कृत्रिम बादलों के माध्यम से वर्षा भी की जा सकती है । अणुशक्ति द्वारा मानव कल्याण सम्बन्धी अनेक कार्य किए जा रहे हैं ।

शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए अणुशक्ति का विकास किया जा रहा है । इस शक्ति के माध्यम से पृथ्वी और समुद्र से मूल्यवान् गैस व खनिज प्राप्त किए जा रहे हैं ।

3- विज्ञान के चमत्कारों से लाभ एवं हानि

लाभ 

विज्ञान ने मानव को वरदायिनी शक्तियाँ प्रदान की हैं तथा मानव के कठिन जीवन को सरल बना दिया है । उसने मनुष्य को प्रत्येक क्षेत्र में सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं तथा उसे बाढ़ , अकाल और महामारी से बचाया है ।

इसके अतिरिक्त मनुष्य को नीरोग बनाने में सहायता करके उसे दीर्घायु बनाया है, रहन – सहन सम्बन्धी सुविधाएँ प्रदान करके उसके जीवन को सुखमय किया है तथा अपराधों को कम करने में भी सहायता की है।

अब तो ‘ लाई डिटेक्टर ‘ मशीन की सहायता से व्यक्ति के अपराध का पता लगाना और भी अधिक सरल हो गया है । जहाँ विज्ञान ने मनुष्य को अनेक दृष्टियों से लाभान्वित किया है, वहीं उसे भयंकर हानियाँ भी पहुंचाई हैं।

हानि 

वैज्ञानिक उपकरणों ने मनुष्य को कामचोर बना दिया है । यन्त्रों के अत्यधिक उपयोग ने देश में बेकारी को जन्म दिया है । नवीन प्रयोगों ने वातावरण को दूषित कर दिया है ।

परमाणु – परीक्षणों ने मानव को भयाक्रान्त कर दिया है । जापान के नागासाकी और हिरोशिमा नगरों का विनाश विज्ञान की ही देन है ।

मनुष्य अपनी पुरानी परम्पराएँ और आस्थाएँ भूलकर भौतिकवादी होता जा रहा है । वह स्वार्थी हो रहा है तथा उसमें विश्वबन्धुत्व की भावना लुप्त हो रही है।

वैज्ञानिक आविष्कारों की निरन्तर स्पर्धा आज विश्व को खतरनाक मोड़ पर ले जा रही है । परमाणु तथा हाइड्रोजन बम निःसन्देह विश्व – शान्ति के लिए खतरा बन गए हैं । इनके प्रयोग से किसी भी क्षण सम्पूर्ण विश्व और उसकी संस्कृति पलभर में नष्ट हो सकती है ।

4. विज्ञान और मनुष्य का सम्बन्ध

 मानव और विज्ञान का परस्पर अटूट सम्बन्ध है । आज का मानव वैज्ञानिक मानव बन गया है । विज्ञान की शक्ति पाकर मानव बर्बर होता जा रहा है । अब मानव के साधारण व्यवहार से लेकर उसका विशिष्ट व्यवहार तक विज्ञान पर आश्रित है । आज मानव के विवेक को जाग्रत करने की आवश्यकता है जिससे वह विज्ञान का वरदानी रूप ग्रहण कर सके, अभिशप्त रूप नहीं ।

7- उपसंहार :

वास्तव में विज्ञान मानव के लिए वरदान सिद्ध हुआ है । हमारा जीवन विज्ञान का ऋणी है । विज्ञान के आविष्कारों से धरती को स्वर्ग बनाया जा सकता है । जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हम वैज्ञानिक चमत्कारों के ऋणी है । सत्य तो यह है कि विज्ञान के चमत्कार है ।

आशा है की  विज्ञान एक अभिशाप से आपको बहुत कुछ सीखने को मिला होगा आप इसे शेयर जरूर करें |

अगर आपको ये लेख Vigyan Ke Chamatkar Par Nibandh पसंद आये तो शेयर जरूर करें |

विज्ञान : वरदान या अभिशाप

विज्ञान : वरदान या अभिशाप

Vigyan Vardan Ya Abhishap Par Nibandh

विज्ञान : वरदान या अभिशाप पर 

ये vigyan vardan ya abhishap par nibandh विभिन्न बोर्ड जैसे UP Board, Bihar Board और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को दृश्टिगत रखते हुए लिखा गया है, अगर आपके मन  सवाल हो तो comment लिख कर पूछ सकते हैं |

इस शीर्षक से मिलते-जुलते अन्य सम्बंधित शीर्षक –

  • विज्ञान का सदुपयोग , विज्ञान के लाभ और हानियाँ ,
  • विज्ञान और नव – कल्याण , विज्ञान के वरदान ( 2001 , 03 ) ,
  •  विज्ञान वरदान भी , अभिशाप भी ,
  •  विज्ञान वरदान या अभिशाप ( 2004 )

” वास्तव में विज्ञान ने जितनी समस्याएँ हल की हैं , उतनी ही नई समस्याएँ खड़ी भी कर दी हैं । ” – श्रीमती इन्दिरा गांधी 

जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान – अटल बिहारी बाजपाई  

Vigyan Vardan Ya Abhishap Par Nibandh आलावा इसे भी पढ़ें :

Vigyan Vardan Ya Abhishap Par Nibandh की  रूपरेखा 

  1. प्रस्तावना
  2. विज्ञान : वरदान के रूप में
  3. विज्ञान : एक अभिशाप के रूप में
  4. विज्ञान : वरदान या अभिशाप ?
  5. उपसंहार

1- प्रस्तावना 

यद्यपि इस पृथ्वी पर मनुष्य को उत्पन्न हुए लाखों वर्ष व्यतीत हो चुके हैं , किन्तु वास्तविक वैज्ञानिक उन्नति पिछले दो – सौ वर्षों में ही हुई है ।

साहित्य में विमानों और दिव्यास्त्रों के कवित्वमय उल्लेख के अतिरिक्त कोई ऐसे प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं , जिनके आधार पर यह सिद्ध हो सके कि प्राचीनकाल में इस प्रकार की वैज्ञानिक उन्नति हुई थी ।

एक समय था , जब मनुष्य सष्टि की प्रत्येक वस्तु को कौतुहलपूर्ण व आश्चर्यजनक समझता था तथा उनसे भयभीत होकर ईश्वर की प्रार्थना करता था, किन्त आज विज्ञान ने प्रकृति को वश में करके उसे मानव की दासी बना दिया है ।

आधुनिक युग में विज्ञान के नवीन आविष्कारों ने विश्व में क्रान्ति – सी उत्पन्न कर दी है । विज्ञान के बिना मनुष्य के स्वतन्त्र अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती । विज्ञान की सहायता से मनुष्य प्रकृति पर निरन्तर विजय प्राप्त करता जा रहा है ।

आज से कुछ वर्ष पूर्व विज्ञान के आविष्कारों की चर्चा से ही लोग आश्चर्यचकित हो जाया करते थे ; परन्तु आज वही आविष्कार मनुष्य के जीवन में पूर्णतया घुल – मिल गए हैं । विज्ञान ने हमें अनेक सुख – सुविधाएँ प्रदान की हैं ; किन्तु साथ ही विनाश के विविध साधन भी जुटा दिए हैं।

इस स्थिति में यह प्रश्न विचारणीय हो गया है कि विज्ञान मानव कल्याण के लिए कितना उपयोगी है ? वह समाज के लिए वरदान है या अभिशाप ?

2- विज्ञान : वरदान के रूप में

वरदान के रूप में आधुनिक विज्ञान ने मानव – सेवा के लिए अनेक प्रकार के साधन जुटा दिए हैं । पुरानी कहानियों में वर्णित अलादीन के चिराग का दैत्य जो काम करता था , उन्हें विज्ञान बड़ी सरलता से कर देता है ।

रातो – रात महल बनाकर खड़ा कर देना , आकाश – मार्ग से उड़कर दूसरे स्थान पर चले जाना , शत्रु के नगरों को मिनटों में बरबाद कर देना आदि विज्ञान के द्वारा सम्भव किए गए ऐसे ही कार्य हैं । विज्ञान मानव – जीवन के लिए वरदान सिद्ध हआ है ।

उसकी वरदायिनी शक्ति ने मानव को अपरिमित सुख – समृद्धि प्रदान की है ; यथा

( क ) परिवहन के क्षेत्र में- पहले लम्बी यात्राएँ दुरूह स्वप्न – सी लगती थीं , किन्तु आज रेल , मोटर और वायुयानों ने लम्बी यात्राओं को अत्यन्त सुगम व सुलभ कर दिया है । पृथ्वी पर ही नहीं, आज के वैज्ञानिक साधनों के द्वारा मनुष्य ने चन्द्रमा पर भी अपने कदमों के निशान बना दिए हैं ।

( ख ) संचार के क्षेत्र में – टेलीफोन , टेलीग्राम , टेलीप्रिण्टर , टैलेक्स , फैक्स , ई – मेल आदि के द्वारा क्षणभर में एक स्थान से दूसरे स्थान को सन्देश पहुँचाए जा सकते हैं । रेडियो और टेलीविजन द्वारा कुछ ही क्षणों में किसी समाचार को विश्व भर में प्रसारित किया जा सकता है ।

( ग ) चिकित्सा के क्षेत्र में- चिकित्सा के क्षेत्र में तो विज्ञान वास्तव में वरदान सिद्ध हुआ है । आधुनिक चिकित्सा – पद्धति इतनी विकसित हो गई है कि अन्धे को आँखें और विकलांगों को अंग मिलना अब असम्भव नहीं है । कैसर , टी०बी० , हृदयरोग जैसे भयंकर और प्राणघातक रोगों पर विजय पाना विज्ञान के माध्यम से ही सम्भव हो सका है ।

( घ ) खाद्यान्न के क्षेत्र में- आज हम अन्न उत्पादन एवं उसके संरक्षण के मामले में आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं । इसका श्रेय आधुनिक विज्ञान को ही है। विभिन्न प्रकार के उर्वरकों, कीटनाशक दवाओं, खेती के आधुनिक साधनों तथा सिंचाई सम्बन्धी कृत्रिम व्यवस्था ने खेती को अत्यन्त सरल व लाभदायक बना दिया है ।

( ङ ) उद्योगों के क्षेत्र में- उद्योगों के क्षेत्र में विज्ञान ने क्रान्तिकारी परिवर्तन किए हैं । विभिन्न प्रकार मशीनों ने उत्पादन की मात्रा में कई गुना वृद्धि की है । ।

( च ) दैनिक जीवन में- हमारे दैनिक जीवन का प्रत्येक कार्य अब विज्ञान पर ही आधारित है । विद्युत् हमार जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग बन गई है । बिजली के पंखे, LPG गैस, स्टोव, फ्रिज आदि के निर्माण ने सुविधापूर्ण जीवन का वरदान दिया है।

इन आविष्कारों से समय, शक्ति और धन की पर्याप्त बचत हुई है । विज्ञान ने हमारे जीवन को इतना अधिक परिवर्तित कर दिया है कि यदि दो – सौ वर्ष पूर्व का कोई व्यक्ति हम देखे तो वह यही समझेगा कि हम स्वर्ग में रह रहे हैं ।

यह कहने में कोई अतिशयोक्ति न होगी कि भविष्य का विज्ञान मृत व्यक्ति को भी जीवन दे सकेगा । इसलिए विज्ञान को वरदान न कहा जाए तो और क्या कहा जाए ?

3- विज्ञान : एक अभिशाप के रूप में

एक अभिशाप के रूप में विज्ञान का एक दूसरा पहलू भी है । विज्ञान ने मनुष्य के हाथ में बहुत अधिक शक्ति दे दी है , किन्तु उसके प्रयोग पर कोई बन्धन नहीं लगाया है।

स्वार्थी मानव इस शक्ति का प्रयोग जितना रचनात्मक कार्यों के लिए कर रहा है , उससे अधिक प्रयोग विनाशकारी कार्यों के लिए भी कर रहा है । सुविधा प्रदान करने वाले उपकरणों ने मनुष्य को आलसी बना दिया है।

यन्त्रों के अत्यधिक उपयोग ने देश में बेरोजगारी को जन्म दिया है। परमाणु – अस्त्रों के परीक्षणों ने मानव को भयाक्रान्त कर दिया है।

जापान के नागासाकी और हिरोशिमा नगरों का विनाश विज्ञान की ही देन माना गया है । मनुष्य अपनी पुरानी परम्पराएँ और आस्थाएँ भूलकर भौतिकवादी होता जा रहा है ।

भौतिकता को अत्यधिक पहत्त्व देने के कारण उसमें विश्वबन्धुत्व की भावना लुप्त होती जा रही है । परमाणु तथा हाइड्रोजन बम निःसन्देह विश्व – शान्ति के लिए खतरा बन गए हैं । इनके प्रयोग से किसी भी क्षण सम्पूर्ण विश्व तथा विश्व – संस्कृति का विनाश पल भर में ही सम्भव है ।

4. विज्ञान : वरदान या अभिशाप ?

यह प्रश्न भी बहुत स्वाभाविक है कि क्या कम्प्यूटर और मानव – मस्तिष्क का तुलना की जा सकती है और इनमें कौन श्रेष्ठ है ; क्योंकि कम्प्यूटर के मस्तिष्क का निर्माण भी मानव – बुद्धि के पर ही सम्भव हुआ है ।

यह बात नितान्त सत्य है कि मानव मस्तिष्क की अपेक्षा कम्प्यूटर समस्याओं को बहुत हल कर सकता है, किन्तू  वह मानवीय संवेदनाओं , अभिरुचियों , भावनाओं और चित्त से रहित मात्र एक यन्त्र – पुरुष है ।

कम्प्यूटर केवल वही काम कर सकता है । जिसके लिए उसे निर्देशित ( programmed ) किया गया हो । वह कोई निर्णय स्वयं नहीं ले सकता और न ही कोई नवीन बात सोच सकता है ।

7- उपसंहार :

विज्ञान का वास्तविक लक्ष्य है – मानव – हित और मानव – कल्याण । यदि विज्ञान अपने इस उद्देश्य की दिशा में पिछड़ जाता है तो विज्ञान को त्याग देना ही हितकर होगा ।

राष्ट्रकवि रामधारीसिंह ‘ दिनकर ‘ ने अपनी इस धारणा को इन शब्दों में व्यक्त किया है

“सावधान , मनुष्य , यदि विज्ञान है तलवार ,

तो इसे दे फेंक , तजकर मोह, स्मृति के पार।

हो चुका है सिद्ध , है तू शिशु अभी अज्ञान,

फूल – काँटों की तुझे कुछ भी नहीं पहचान।

खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार,

काट लेगा अंग, तीखी है बड़ी यह धार।

आशा है की  विज्ञान एक अभिशाप से आपको बहुत कुछ सीखने को मिला होगा आप इसे शेयर जरूर करें |

अगर आपको ये लेख Vigyan Vardan Ya Abhishap Par Nibandh पसंद आये तो शेयर जरूर करें |

कम्प्यूटर : आधुनिक यन्त्र – पुरुष

कम्प्यूटर : आधुनिक यन्त्र – पुरुष

Computer Par Nibandh in Hindi

कम्प्यूटर : आधुनिक यन्त्र – पुरुष

ये computer par nibandh in hindi विभिन्न बोर्ड जैसे UP Board, Bihar Board और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को दृश्टिगत रखते हुए लिखा गया है, अगर आपके मन  सवाल हो तो comment लिख कर पूछ सकते हैं |

इस शीर्षक से मिलते-जुलते अन्य सम्बंधित शीर्षक –

  • कम्प्यूटर की उपयोगिता ( 2002 , 05 )
  • कम्प्यूटर एवं उसका महत्त्व

” प्रगति के इस दौर में कम्प्यूटर एक सशक्त माध्यम के रूप में उभरा है । कम्प्यूटर का आविष्कार मानव – बुद्धि की कुशाग्रता का परिणाम है । जाहिर है कि इसकी कार्यकुशलता हमारे हाथों में ही – सत्यजीत मजूमदार

 Computer Par Nibandh in Hindi आलावा इसे भी पढ़ें :

Mere Sapno Ka Bharat Par Nibandh की  रूपरेखा 

  1. प्रस्तावना
  2. कम्प्यूटर क्या है ?
  3. कम्प्यूटर और उसके उपयोग
  4. कम्प्यूटर और मानव – मस्तिष्क
  5. उपसंहार

1- प्रस्तावना 

गत कई वर्षों से हमारे देश में कम्प्यूटरों की चर्चा जोर-शोर से हो रही है। देश को कम्प्युटरमय करने के प्रयास किए जा रहे हैं। कई उद्योग-धन्धों और संस्थानों में कम्प्यूटर का प्रयोग होने लगा है ।

कम्प्यूटरों के उन्मुक्त आयात के लिए देश के द्वार खोल दिए गए हैं। हमारे अधिकारी और मन्त्रिगण सुपर कम्प्यूटरों के लिए अमेरिका से जापान तक दौड़ लगा रहे हैं। सरकारी प्रतिष्ठानों में तो आधुनिकतम कम्प्यूटर लगाने की भारी होड़ लगी |

2- कम्प्यूटर क्या है ?

हमारे सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक जीवन पर छा – जानेवाला कम्प्यूटर आखिर क्या है ?

इस विषय में जिज्ञासा उत्पन्न होना स्वाभाविक है। वस्तुत : कम्प्यूटर ऐसे यान्त्रिक मस्तिष्कों का समन्वयात्मक एवं गुणात्मक योग है, जो तीव्रतम गति से तथा न्यूनतम समय में त्रुटिहीन गणना कर सकता है। मानव सदैव से ही अपनी गणितीय गणनाओं के लिए गणना – यन्त्रों का प्रयोग करता रहा है ।

इस कार्य के लिए प्रयोग की जानेवाली प्राचीन मशीनों में अबेकस ( Abacus ) पहला साधन था। वर्तमान समय में तो अनेक प्रकार के जटिल गणना – यन्त्र बना लिए गए हैं, जो जटिल – से – जटिल गणनाओं के परिकलन ( Calculation ) स्वतः ही कर लेते हैं । इन सबमें सर्वाधिक तीव्र , शद्ध एवं उपयोगी गणना करनेवाला यन्त्र कम्प्यूटर ही है।

चार्ल्स बेबेज ( Charles Babbage ) पहले व्यक्ति थे , जिन्होंने 19वीं शताब्दी के आरम्भ में पहला कम्प्यूटर बनाया। यह कम्प्यूटर लम्बी – लम्बी गणनाएँ कर उनके परिणामों को मुद्रित कर देता था।

कम्प्यूटर स्वयं ही गणनाएँ करके जटिल – से – जटिल समस्याओं के हल मिनटों और सेकण्डों में निकाल सकता है , जिन समस्याओं का हल करने के लिए मनुष्य को कई दिन , यहाँ तक कि महीनों लग सकते हैं।

कम्प्यूटर से की जानेवाली गणनाओं के लिए एक विशेष भाषा में निर्देश तैयार किए जाते हैं । इन निर्देशों और सूचनाओं को कम्प्यूटर का ‘ प्रोग्राम ‘ कहा जाता है ।

यदि कम्प्यूटर से प्राप्त होनेवाले परिणाम अशुद्ध हैं तो इसका तात्पर्य यह है कि उसके ‘ प्रोग्राम में कहीं – न – कहीं त्रुटि रह गई है . इसमें यन्त्र का कोई दोष नहीं है । कम्प्यूटर का केन्द्रीय मस्तिष्क अपने सारे काम संकेतों पर आधारित गणितीय भाषा में ही करता है ।

अक्षरों या शब्दों को भी संकेतों पर आधारित इस मशीनी भाषा में बदला जा सकता है । इसी तरह अब शब्दों या पाठों को, यहाँ तक कि पूरी पुस्तकों और फाइलों को भी कम्प्यूटर के स्मृति – भण्डार ( मेमोरी ) में सुरक्षित रखा जा सकता है । कम्प्यूटर के स्मृति – भण्डार में संचित सामग्री को कभी भी इच्छानुसार छापा जा सकता है ।

3- कम्प्यूटर और उसके उपयोग

आज जीवन के कितने ही क्षेत्रों में कम्प्यूटर के व्यापक प्रयोग हो रहे हैं । बड़े – बड़े व्यवसाय , तकनीकी संस्थान और महत्त्वपूर्ण प्रतिष्ठान कम्प्यूटर के यन्त्र – मस्तिष्क का लाभ प्राप्त कर रहे हैं । कम्प्यूटर एक वरदान है |

अब तो कम्प्यूटर केवल कार्यालयों के वातानुकूलित कक्षों तक ही सीमित नहीं रह गए हैं, वरन् वह हजारों किलोमीटर दूर रखे हुए दूसरे कम्प्यूटर के साथ बातचीत कर सकते हैं , उससे सूचनाएँ प्राप्त कर सकते हैं और उसे सूचनाएँ भेज भी सकते हैं ।

कम्प्यूटर का व्यापक प्रयोग जिन क्षेत्रों में हो रहा है , उनका विवरण इस प्रकार है-

( क ) बैंकिंग के क्षेत्र में भारतीय बैंकों में खातों के संचालन और हिसाब – किताब रखने के लिए कम्प्यूटर का प्रयोग किया जाने लगा है । कई राष्ट्रीयकृत बैंकों ने चुम्बकीय संख्याओं वाली नई चैक बुक जारी की हैं ।

यूरोप के कई देशों सहित अपने देश में भी ऐसी व्यवस्थाएँ अस्तित्व में आ गई हैं कि घर के निजी कम्प्यूटर को बैंकों के कम्प्यूटरों के साथ जोड़कर घर बैठे ही लेन – देन का व्यवहार किया जा सकता है ।

( ख ) प्रकाशन के क्षेत्र में समाचार – पत्र और पुस्तकों के प्रकाशन के क्षेत्र में भी कम्प्यूटर विशेष योग दे रहे हैं । अब तो कम्प्यूटर टंकित होनेवाली सामग्री को कम्प्यूटर के परदे ( स्क्रीन ) पर देखकर उसमें संशोधन भी , किया जा सकता है ।

कम्प्यूटर में संचित होने के बाद सम्पूर्ण सामग्री एक छोटी चुम्बकीय डिस्क पर अंकित हो जाती है । इससे कभी भी टंकित सामग्री को प्रिंटर की सहायता से मुद्रित किया जा सकता है ।

उस दिन की कल्पना सरलता से की जा सकती है , जब समाचार – पत्रों के सम्पादकीय विभाग में एक ओर कम्प्यूटरों में मैटर भरे जाएँगे तो दूसरी ओर इलेक्ट्रॉनिक प्रिण्टर तेज रफ्तार से मुद्रित सामग्री तैयार कर देंगे ।

( ग ) सूचना और समाचार – प्रेषण के क्षेत्र में – दूरसंचार की दृष्टि से कम्प्यूटर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है । अब तो ‘ कम्प्यूटर नेटवर्क के माध्यम से देश के प्रमुख नगरों को एक – दूसरे से जोड़ने की व्यवस्था भी की जा रही है ।

( घ ) डिजाइनिंग के क्षेत्र में प्राय : यह समझा जाता है कि कम्प्यूटर अंकों और अक्षरों को ही प्रकट कर सकते हैं । वस्तुत : आधुनिक कम्प्यूटर के माध्यम से भवनों, मोटरगाड़ियों एवं हवाई जहाजों आदि के डिजाइन तैयार करने के लिए भी ‘ कम्प्यूटर ग्राफिक ‘ के व्यापक प्रयोग हो रहे हैं । वास्तुशिल्पी अपनी डिजाइन कम्प्यूटर के स्क्रीन पर तैयार करते हैं और संलग्न प्रिण्टर से इनके प्रिण्ट भी तरन्त प्राप्त कर लेते हैं ।

( ङ ) कला के क्षेत्र में कम्प्यूटर अब कलाकार अथवा चित्रकार की भूमिका भी निभा रहे हैं । अब . कलाकार को न तो कैनवास की आवश्यकता है , न रंग और कृचियों की । कम्प्यूटर के सामने बैठा हआ कला अपने ‘ नियोजित प्रोग्राम के अनुसार स्क्रीन पर चित्र निर्मित करता है और यह चित्र प्रिण्ट की ‘ कुंजी ‘ दबाते ही प्रिण्टर द्वारा कागज पर अपने उन्हीं वास्तविक रंगों के साथ छाप दिया जाता है ।

( च ) वैज्ञानिक अनुसन्धान के क्षेत्र में कम्प्यूटरों के माध्यम से वैज्ञानिक अनुसन्धान का स्वरूप ही बदलता जा रहा है । अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में तो कम्प्यूटर ने क्रान्ति ही उत्पन्न कर दी है । इनके माध्यम से । अन्तरिक्ष के व्यापक चित्र उतारे जा रहे हैं और इन चित्रों का विश्लेषण कम्प्यूटरों के माध्यम से हो रहा है । आधुनिक वेधशालाओं के लिए कम्प्यूटर सर्वाधिक आवश्यक हो गए हैं । 7

( छ ) औद्योगिक क्षेत्र में बड़े – बड़े कारखानों में मशीनों के संचालन का कार्य अब कम्प्यूटर सँभाल रहे हैं । कम्प्यूटरों से जुड़कर रोबोट ऐसी मशीनों का नियन्त्रण कर रहे हैं , जिनका संचालन मानव के लिए अत्यधिक कठिन था । भयंकर शीत और जला देनेवाली गर्मी का भी उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । है

( ज ) युद्ध के क्षेत्र में – वस्तुत : कम्प्यूटर का आविष्कार युद्ध के एक साधन के रूप में ही हुआ था । अमेरिका में जो पहला इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर बना था , उसका उपयोग अणुबम से सम्बन्धित गणनाओं के लिए ही हुआ था ।

जर्मन सेना के गुप्त सन्देशों को जानने के लिए अंग्रेजों ने ‘ कोलोसम ‘ नामक कम्प्यूटर का प्रयोग किया था । आज भी नवीन तकनीकों पर आधारित शक्तिशाली कम्प्यूटरों का विकास किया जा रहा है । अमेरिका की ‘ स्टार – वार्स ‘ योजना कम्प्यूटरों के नियन्त्रण पर ही आधारित है ।

( झ ) अन्य क्षेत्रों में – सम्भवत : जीवन का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है , जिसमें कम्प्यूटर का प्रयोग न हो रहा हो अथवा न हो सकता हो । कम्प्यूटरों के माध्यम से संगीत का स्वरांकन किया जा रहा है तथा वायुयान एवं रेलयात्रा के आरक्षण की व्यवस्था हो रही है।

कम्प्यूटर में संचित विवरण के आधार पर विवाह – सम्बन्ध जोड़नेवाले अनेक संगठन हमारे देश में कार्यरत हैं , यहाँ तक कि ‘ कम्प्यूटर – ज्योतिष ‘ का व्यवसाय भी आरम्भ हो गया है ।

इसके साथ ही परीक्षाफल के निर्माण , अन्तरिक्ष – यात्रा , मौसम सम्बन्धी जानकारी , चिकित्सा – क्षेत्र चुनाव – कार्य आदि में भी कम्प्यटर प्रणाली सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध हो रही है । कम्प्यूटर की सहायता से एक भाषा का अनुवाद दूसरी भाषा में किया जा सकता है तथा शतरंज जैसा खेल भी खेला जा सकता है ।

4. कम्प्यूटर और मानव – मस्तिष्क

यह प्रश्न भी बहुत स्वाभाविक है कि क्या कम्प्यूटर और मानव – मस्तिष्क का तुलना की जा सकती है और इनमें कौन श्रेष्ठ है ; क्योंकि कम्प्यूटर के मस्तिष्क का निर्माण भी मानव – बुद्धि के पर ही सम्भव हुआ है ।

यह बात नितान्त सत्य है कि मानव मस्तिष्क की अपेक्षा कम्प्यूटर समस्याओं को बहुत हल कर सकता है, किन्तू  वह मानवीय संवेदनाओं , अभिरुचियों , भावनाओं और चित्त से रहित मात्र एक यन्त्र – पुरुष है ।

कम्प्यूटर केवल वही काम कर सकता है । जिसके लिए उसे निर्देशित ( programmed ) किया गया हो । वह कोई निर्णय स्वयं नहीं ले सकता और न ही कोई नवीन बात सोच सकता है ।

7- उपसंहार :

भारत जिस गति से कम्प्यूटर – युग की ओर बढ़ रहा है , उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि हम अपने आपको सम्पूर्ण रूप से कम्प्यूटर के हवाले करने के लिए विवश किए जा रहे हैं।

कम्प्यूटर हमें बोलना , व्यवहार करना , अपने जीवन को जीना , मित्रों से मिलना और उनके विषय में ज्ञान प्राप्त करना आदि सबकुछ सिखाएगा । इसका अभिप्राय यह हुआ कि हम जीवन के प्रत्येक मोड़ पर कम्प्यूटर पर ही आश्रित हो जाएँगे ।

यह सही है कि कम्प्यूटर में जो कुछ भी एकत्र किया गया है , वह आज के असाधारण बुद्धिजीवियों की देन है|

लेकिन हम यह प्रश्न भी पूछने के लिए विवश हैं कि जो बुद्धि या जो स्मरण – शक्ति कम्प्यूटरों को दी गई है , क्या उससे पृथक् हमारा कोई अस्तित्व नहीं है ? हो भी , तो क्या यह बात अपने – आप में कुछ कम दुःखदायी नहीं है कि हम अपने प्रत्येक भावी कदम को कम्प्यूटर के माध्यम से प्रमाणित करना चाहें और उसके परिणामस्वरूप अपने – आपको निरन्तर कमजोर , हीन एवं अयोग्य बनाते रहें ।

आशा है की  कम्प्यूटर निबंध से आपको बहुत कुछ सीखने को मिला होगा आप इसे शेयर जरूर करें |

अगर आपको ये लेख Computer Par Nibandh in Hindi पसंद आये तो शेयर जरूर करें |

मेरे सपनों का भारत पर निबंध

मेरे सपनों का भारत पर निबंध

Mere Sapno Ka Bharat Par Nibandh

मेरे सपनों का भारत पर निबंध

ये Mere Sapno Ka Bharat Par Nibandh विभिन्न बोर्ड जैसे UP Board, Bihar Board और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को दृश्टिगत रखते हुए लिखा गया है, अगर आपके मन  सवाल हो तो comment लिख कर पूछ सकते हैं |

इस शीर्षक से मिलते-जुलते अन्य सम्बंधित शीर्षक –

  • मेरा देश और मेरे सपने
  • मेरा भारत कैसा हो ?

Mere Sapno Ka Bharat Par Nibandh आलावा इसे भी पढ़ें :

Mere Sapno Ka Bharat Par Nibandh की  रूपरेखा 

  1. प्रस्तावना
  2. मेरा गौरवशाली भारत
  3. आधुनिक भारत
  4. मेरा देश और मेरे सपने
  5. उपसंहार

1- प्रस्तावना 

इसमें सन्देह नहीं कि प्रत्येक देश का निवासी अपने देश पर प्राण न्योछावर करने को तत्पर रहता है । वह अपने देश को ही श्रेष्ठ मानता है ।

मैं भी अपने देश से प्रेम करता हूँ और कह सकता हूँ सम्पूर्ण देशों से अधिक जिस देश का उत्कर्ष है, वह देश मेरा देश है, वह देश भारतवर्ष है। जब संसार में सभ्यता का विकास भी नहीं हुआ था , तब भारत के ऋषियों ने गहन ज्ञान पर आधारित वेद जैसे ग्रन्थों की रचना कर डाली थी।

उन्होंने घने वनों में , नदी के तट पर या पर्वतों की गुफाओं में रहते हुए, कन्दमूल – फल खाकर , सरल एवं सादा जीवन व्यतीत करके मनुष्य के मन को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित किया था।

आध्यात्मिक रूप से ही नहीं, भौतिक रूप से भी भारत सम्पन्न देश रहा है। प्राचीनकाल में तो भारत ‘ सोने की चिड़िया ‘ कहलाता था । विज्ञान , ज्योतिष , नक्षत्र – विद्या , गणित , चिकित्साशास्त्र , अर्थशास्त्र आदि विषयों के विद्वानों ने भारत की पावन धरती पर ही जन्म लिया था।

उन्होंने अनेक देशों को सभ्यता एवं ज्ञान की शिक्षा भी दी थी । मेरे देश का नाम ‘ भारत ‘ ; प्रतापी राजा दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र ‘ भरत ‘ के नाम पर पड़ा। भारत प्राचीनकाल से ही एक महान् देश रहा है ।

हमें अपने इस महान् देश के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए ।

कविवर नीरज ने भारत – भूमि के सम्बन्ध में लिखा है

“रही जहाँ पर नित्य विहरती मधु की बेला ,

अंचल – अंचल नित्य नवामोदों से खेला ।

जिसका गौरव लिए मही , निज अंचल भरती ,

अखिल धरा पर यही सभ्यताओं की धरती । “

2- मेरा गौरवशाली भारत

मेरा देश एक विशाल देश है। इसमें 28 राज्य और 7 केन्द्रशासित प्रदेश हैं ।

यहाँ विभिन्न जातियों के लोग रहते हैं । भारत के उत्तर में हिमालय और दक्षिण में हिन्द महासागर हैं । इस भारत – भूमि में अनेक नदियाँ , मैदान और मरुस्थल हैं ।

भारत कृषिप्रधान देश है । यहाँ गेहूँ , मक्का , ज्वार , बाजरा , चना , धान , गन्ना आदि फसलें होती हैं ।

भारत में ही पृथ्वीराज , चन्द्रगप्त , अशोक , विक्रमादित्य आदि अनेक वीर पुरुषों ने जन्म लिया है ।

हरिद्वार , काशी , मथुरा , द्वारका , प्रयाग , अजमेर आदि भारत के पावन तीर्थ – स्थल हैं । यहाँ अनेक दर्शनीय स्थल भी हैं ।

स्वामी विवेकानन्द , स्वामी दयानन्द , महात्मा गांधी , भगतसिंह , रामकृष्ण परमहंस , चन्द्रशेखर आजाद , शिवाजी , गुरु गोविन्दसिंह आदि महापुरुषों ने भारत की भूमि को अपने श्रेष्ठ कर्मों की सुगन्ध से महकाया है ।

यहाँ तेल , गैस , लोहा , कोयला , हीरे , सोने आदि की खानें और भण्डार हैं । यह पूर्ण रूप से समृद्ध एवं समुन्नत देश है ।

3- आधुनिक भारत

प्राचीनकाल में हमारा देश मुसलमान आक्रमणकारियों का गुलाम बना । उनके चंगुल से छूटा भी न था कि यहाँ अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया । अनेक युद्धों और निरन्तर संघर्ष के पश्चात् यह उस गुलामी से मुक्त हुआ और धरि – धीरे यहाँ विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति होती गई।

आज हम देखते हैं कि हमने प्रगति तो की है, किन्तु हम स्वयं ही अपना विनाश करने पर भी तुले हैं । देश में भ्रष्टाचार , चोरी , अनीति और जमाखोरी आदि ने बुराइयों ने जन्म ले लिया है । देश की सीमाओं पर युद्ध के बादल मॅडरा रहे हैं । सर्वत्र भय आतंक और विक्षोभ का वातावरण व्याप्त है ।

ऐसे में में अपने प्रिय भारत के लिए अनेक सपने देखा करता हूँ और इन सब करीतियों को समाप्त कर देना चाहता हूं । . .

4. मेरा देश और मेरे सपने

प्रत्येक भारतवासी जो अपने देश से प्यार करता है, इसके प्रति यही सपने देखता पुनः रामराज्य की स्थापना हो, हमारा राष्ट्र विश्वभर में महान् बने । मैं भी अपने भारत के सुखमय भविष्य के सपने देखता हूँ। मैंने भावी भारत के लिए कुछ सपने सँजोए हैं , जिनमें मैंने भव्य एवं महान् भारत की तस्वीर देखी है।

मैंने भावी भारत के सपने कुछ इस प्रकार देखे हैं-

( क ) राजनैतिक उत्कर्ष – मैं चाहता हूँ कि मेरा भारत जन – जन के लिए मंगलकारी और लोकतान्त्रिक दृष्टि से विश्व का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बने । जन – जन में राजनैतिक जागरूकता उत्पन्न हो और देश का प्रत्येक नागरिक राष्ट्रहित के सम्बन्ध में सोचे । उनमें परस्पर सद्भाव स्थापित हो।

विश्व – शान्ति की वंशी के स्वर दिग्दिगन्त में गूंजे | मेरी आकांक्षा है कि मेरा भारत ऐसा राजनैतिक उत्कर्ष लिए हुए हो कि किसी भी देश की कलुषित दृष्टि हमारे देश पर न पड़े । .

( ख ) राष्ट्रीय एकता – हमारे देश में विभिन्न धर्मो और जातियों के लोग रहते हैं । उनमें धार्मिक एवं साम्प्रदायिक झगड़े होते रहते हैं । सर्वत्र जातिवाद का बोलबाला है । ऐसा प्रतीत होता है जैसे हमारे राष्ट्र के नागरिक राष्ट्रीय एकता की महत्ता को पूर्णतः विस्मृत कर चुके हैं ।

मैं उस दिन के सपने देखता हूँ जब भारत से जातिवाद और साम्प्रदायिकता पर आधारित झगड़ों का पूर्णतः अन्त हो जाएगा , भाषागत विरोध नहीं होगा और सम्पूर्ण देश एकता के सूत्र से बँधा होगा और सब कहेंगे

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।

हिन्दी हैं हम , वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा ॥

( ग ) आर्थिक समृद्धि – मैं सोचता हूँ मेरा भारत पुनः ‘ सोने की चिड़िया ‘ बन जाए । यहाँ कोई भूखा न रहे , प्रत्येक प्राणी के तन पर वस्त्र और रहने के लिए आवास हो । गरीबी , बेरोजगारी और अशिक्षा का प्रभुत्व समाप्त हो तथा प्रत्येक दिशा में ‘ सुजलां सुफलां मलयंज शीतलां शस्यश्यामलां मातरम् ‘ का स्वर गूंज उठे ।

( घ ) आध्यात्मिक विकास – भारतभूमि पुण्यभूमि है, अध्यात्मभूमि है । मेरी कामना है कि मानव भौतिकवादी सुखों के मोह को त्यागकर आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख हो । मेरे मानस – पटल पर भावी भारत का जो चित्र है , उसमें मैं अपने देश को समस्त विश्व में मंगल – वर्षा करनेवाले अक्षय आलोक – केन्द्र के रूप में देखता हूँ । .

( ङ ) विश्वमंगलकारिणी भारतीय संस्कृति का प्रसार – मेरे सपनों का भारत ऐसा भारत हो , जो पुनः ‘ वसुधैव कुटुम्बकम् ‘ का घोष करे । भारतभूमि से मानव – कल्याण की कामना को व्यक्त करनेवाली इन पंक्तियों को सभी भारतवासी समवेत स्वर में गा उठे सर्वे भवन्तु सुखिनः , सर्वे सन्तु निरामया । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , मा कश्चिद दःख भाग्भवेत ॥

( च ) रामराज्य की स्थापना – गोस्वामी तुलसीदास ने अपने महान् ग्रन्थ ‘ श्रीरामचरितमानस ‘ में लिखा है – दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज नहिं काहहिं ब्यापा । रामराज्य का ऐसा साकार रूप ही मेरे सपनों में ‘ उतरता है । मेरी अभिलाषा है कि भारत में रामराज्य का आदर्श रूप पुनः प्रतिष्ठित हो ।

( छ ) वैज्ञानिक विकास – मैं चाहता हूँ कि भारत विश्व में वैज्ञानिक उत्कर्ष का महानतम केन्द्र बने । यहाँ अनेक वैज्ञानिक साधनों का विकास एवं निर्माण हो ; किन्तु इनके द्वारा विश्व – विनाश का नहीं , अपितु विश्व – शान्ति और समृद्धि का द्वार खुले ।

( ज ) विश्व का आदर्श देश – मेरे सपनों का भारत वह होगा जो राजनैतिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक आदि विभिन्न दृष्टियों से उत्कर्ष को प्राप्त होगा और एक दिन भारत का प्रत्येक नागरिक सहज ही यह गा उठेगा –

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा ।

हम बुलबुलें हैं इसकी , यह गुलिस्ताँ हमारा ॥

7- उपसंहार :

भावी भारत के सपनों की पूर्णता के लिए यह स्वश्यक है कि हमारे देश का प्रत्येक नागरिक देश की प्रत्येक कुरीति को समूल रूप से नष्ट करने का दृण संकल्प करे, तभी मेरे स्वप्न मूर्तरूप के सकेंगे |

 

अगर आपको ये लेख Mere Sapno Ka Bharat Par Nibandh पसंद आये तो शेयर जरूर करें |

पर्यावरण प्रदूषण पर निबंध

पर्यावरण प्रदूषण पर निबंध

Paryavaran Pradushan Par Nibandh

पर्यावरण प्रदूषण पर निबंध

ये Paryavaran Pradushan Par Nibandh विभिन्न बोर्ड जैसे UP Board, Bihar Board और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को दृश्टिगत रखते हुए लिखा गया है, अगर आपके मन  सवाल हो तो comment लिख कर पूछ सकते हैं |

इस शीर्षक से मिलते-जुलते अन्य सम्बंधित शीर्षक –

  • पर्यावरण प्रदूषण ( 2004 )
  • बढ़ता प्रदूषण और पर्यावरण ( 2000 , 02 )
  • पर्यावरण संरक्षण सुरक्षा ( 2001 , 03 , 10 )
  • प्रदूषण के दुष्परिणाम
  • पर्यावरण प्रदूषण : कारण एवं निदान ( निवारण ) ( 2005 , 10 )
  • औद्योगिक प्रदूषण : समस्या और समाधान ( 2004 )
  • पर्यावरण की उपयोगिता ( 2004 )
  • पर्यावरण और मानव ।

“ आज हमारा वायुमण्डल अत्यधिक दूषित हो चुका है , जिसकी वजह से मानव का जीवन खतरे में आ गया है । आज यूरोप के कई देशों में प्रदूषण इतना ज्यादा बढ़ गया है , जिसके कारण वहाँ कभी – कभी अम्ल – मिश्रित वर्षा होती है । ओस की बूंदों में भी अम्ल मिला रहता है । यदि समय रहते हुए हमने इस तरफ ध्यान नहीं दिया तो एक दिन विश्व में संकट छा जाएगा । ” –  खनन भारती से उद्धृत

इसे भी पढ़ें :

Paryavaran Pradushan Par Nibandh की  रूपरेखा 

  1. प्रस्तावना
  2. प्रदूषण का अर्थ
  3. विभिन्न प्रकार के प्रदूषण
  4. प्रदूषण पर नियन्त्रण 
  5. उपसंहार

1- प्रस्तावना 

चौदहवीं शताब्दी में मुहम्मद तुगलक के जीवनकाल में इस्लामी दुनिया का प्रसिद्ध यात्री इब्नबतूता भारत आया था ।

अपने संस्मरणों में उसने गंगाजल की पवित्रता और निर्मलता का उल्लेख करते हुए लिखा है कि मुहम्मद तुगलक ने जब दिल्ली छोड़कर दौलताबाद को अपनी राजधानी बनाया तो उसकी अन्य प्राथमिकताओं में अपने लिए गंगा के जल का प्रबन्ध भी सम्मिलित था ।

गंगाजल को ऊँट , घोड़ों और हाथियों पर लादकर दौलताबाद पहुँचाने में डेढ़ – दो महीने लगते थे । कहा जाता है कि गंगाजल तब भी साफ और मीठा बना रहता था ।

तात्पर्य यह है कि गंगाजल हमारी आस्थाओं और विश्वासों का प्रतीक इसी कारण बना था ; क्योंकि वह सभी प्रकार के प्रदूषणों से मुक्त था ; किन्तु अनियन्त्रित औद्योगीकरण , हमारे अज्ञान एवं लोभ की प्रवृत्ति ने देश की अन्य नदियों के साथ गंगा को भी प्रदूषित कर दिया है ।

वैज्ञानिकों का विचार है कि तन – मन की सभी बीमारियों को धो डालने की उसकी औषधीय शक्तियाँ अब समाप्त होती जा रही हैं ।

यदि प्रदूषण इसी गति से बढ़ता रहा तो गंगा के शेष गुण भी शीघ्र ही नष्ट हो जाएंगे और तब ‘ गंगा तेरा पानी अमृत ‘ वाला मुहावरा निरर्थक हो जाएगा ।

2- प्रदूषण का अर्थ 

प्रदूषण वायु, जल एवं स्थल की भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं में होनेवाला वह अवांछनीय परिवर्तन है, जो मनुष्य और उसके लिए लाभदायक दूसरे जन्तुओं, पौधों, औद्योगिक संस्थानों तथा दूसरे कच्चे माल इत्यादि को किसी भी रूप में हानि पहुँचाता है।

प्रदूषण पर्यावरण में दूषक पदार्थों के प्रवेश के कारण प्राकृतिक संतुलन में पैदा होने वाले दोष को कहते हैं। प्रदूषण का अर्थ है – ‘हवा, पानी, मिट्टी आदि का अवांछित द्रव्यों से दूषित होना’

जीवधारी अपने विकास और व्यवस्थित जीवनक्रम के लिए एक सन्तुलित वातावरण पर निर्भर करते हैं । सन्तुलित वातावरण में प्रत्येक घटक एक निश्चित मात्रा में उपस्थित रहते हैं ।

कभी – कभी वातावरण में एक अथवा अनेक घटकों की मात्रा कम अथवा अधिक हो जाया करती है या वातावरण में कुछ हानिकारक घटकों का प्रवेश हो जाता है

परिणामतः वातावरण दूषित हो जाता है ; जो जीवधारियों के लिए किसी – न – किसी रूप में हानिकारक सिद्ध होता है । इसे ही प्रदूषण कहते हैं।

3- विभिन्न प्रकार के प्रदूषण

प्रदूषण की समस्या का जन्म जनसंख्या की वृद्धि के साथ – साथ हुआ है । विकासशील देशों में औद्योगिक एवं रासायनिक कचरे ने जल ही नहीं , वायु और पृथ्वी को भी प्रदूषित किया है ।

भारत जैसे देशों में तो घरेलू कचरे और गन्दे जल की निकासी का प्रश्न ही विकराल रूप से खड़ा हो गया है । विकसित और विकासशील सभी देशों में विभिन्न प्रकार के प्रदूषण विद्यमान हैं । इनमें से कुछ इस प्रकार हैं

( क ) वायु – प्रदूषण (vayu pradushan nibandh) – वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार की गैसें एक विशेष अनुपात में उपस्थित रहती हैं। ऑक्सीजन 21% नाइट्रोजन 78% और अन्य गैसें (कार्बन – डाइ – ऑक्साइड अदि ) होता  है |

जीवधारा अपनी क्रियाओं द्वारा वायमण्डल में ऑक्सीजन और कार्बन – डाइ – ऑक्साइड का सन्तुलन बनाए रखते हैं। अपनी श्वसन प्रक्रिया द्वारा हम ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और कार्बन-डाइ-ऑक्साइड छोड़ते रहते हैं ।

हरे पौधे प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन – डाइ – ऑक्साइड लेकर ऑक्सीजन निष्कासित करते रहते हैं । इससे वातावरण में ऑक्सीजन और कार्बन – डाइ – ऑक्साइड का सन्तुलन बना रहता है ;

मानव अपनी अज्ञानता और आवश्यकता के नाम पर इस सन्तुलन को बिगाड़ता रहता है । इसे ही वायु – प्रदूषण कहते हैं । वायु – प्रदूषण का मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है ।

वायु प्रदूषण से श्वास सम्बन्धी बहुत – से रोग हो जाते हैं । इनमें फेफड़ों का कैंसर , दमा और फेफड़ों से सम्बन्धित दूसरे रोग सम्मिलित हैं ।

वायु में विकिरित अनेक धातुओं के कण भी बहुत – से रोग उत्पन्न करते हैं । सीसे के कण विशेष रूप से नाडीमण्डल सम्बन्धी रोग उत्पन्न करते हैं । कैडमियम श्वसन – विष का कार्य करता है , जो रक्तदाब बढ़ाकर हृदय सम्बन्धी बहुत – से रोग उत्पन्न कर देता है ।

नाइट्रोजन ऑक्साइड से फेफड़ों , हृदय और आँखों के रोग हो जाते हैं । ओजोन नेत्र – रोग, खाँसी एवं सीने की दुःखन उत्पन्न करती है । इसी प्रकार प्रदूषित वायु एग्जीमा तथा मुंहासे आदि अनेक रोग उत्पन्न करती है ।

( ख ) जल – प्रदूषण – सभी जीवधारियों के लिए जल बहुत महत्त्वपूर्ण और आवश्यक है । पौधे भी अपना भोजन जल के माध्यम से ही प्राप्त करते हैं । जल में अनेक प्रकार के खनिज तत्त्व , कार्बनिक – अकार्बनिक पदार्थ तथा गैसें घुली रहती हैं ।

यदि जल में ये पदार्थ आवश्यकता से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाते हैं तो जल प्रदूषित होकर हानिकारक हो जाता है । केन्द्रीय जल – स्वास्थ्य इंजीनियरिंग अनुसन्धान संस्थान के अनुसार भारत में प्रति 1,00,000 व्यक्तियों में से 360 व्यक्तियों की मृत्यु आन्त्रशोथ ( टायफाइड , पेचिश आदि ) से होती है , जिसका कारण अशुद्ध जल है।

शहरों में भी शत-प्रतिशत निवासियों के लिए स्वास्थ्यकर पेयजल का प्रबन्ध नहीं है। देश के अनेक शहरों में पेयजल किसी निकटवर्ती नदी से लिया जाता है और प्रायः इसी नदी में शहर के मल – मूत्रं और कचरे तथा कारखानों से निकलनेवाले अवशिष्ट पदार्थों को प्रवाहित कर दिया जाता है ,

परिणामस्वरूप हमारे देश की अधिकांश नदियों का जल प्रदूषित होता जा रहा है ।

( ग ) रेडियोधर्मी प्रदूषण – परमाणु शक्ति उत्पादन केन्द्रों और परमाणु परीक्षण के फलस्वरूप जल , वायु तथा पृथ्वी का प्रदूषण निरन्तर बढ़ता जा रहा है । यह प्रदूषण आज की पीढ़ी के लिए ही नहीं , वरन् आनेवाली पीढ़ियों के लिए भी हानिकारक सिद्ध होगा ।

विस्फोट के समय उत्पन्न रेडियोधर्मी पदार्थ वायुमण्डल की बाह्य परतों में प्रवेश कर जाते हैं, जहाँ पर वे ठण्डे होकर संघनित अवस्था में बूंदों का रूप ले लेते हैं और बहुत छोटे – छोटे धूल के कणों के रूप में वायु के झोंकों के साथ समस्त संसार में फैल जाते हैं ।

द्वितीय महायुद्ध में नागासाकी तथा हिरोशिमा में हुए-परमाणु बम के विस्फोट से बहुत से मनुष्य अपंग हो गए थे । इतना ही नहीं , इस प्रकार के प्रभावित क्षेत्रों की भावी ‘ सन्तति भी अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो गई ।

( घ ) ध्वनि – प्रदूषण – अनेक प्रकार के वाहन, जैसे मोटरकार , बस , जेट विमान , ट्रैक्टर , लाउडस्पीकर , बाजे एवं कारखानों के सायरन व विभिन्न प्रकार की मशीनों आदि से ध्वनि प्रदूषण उत्पन्न होता है।

ध्वनि की लहरें जीवधारियों की क्रियाओं को प्रभावित करती हैं। अधिक तेज ध्वनि से मनुष्य के सुनने की शक्ति का ह्रास होता है और उसे ठीक प्रकार से नींद भी नहीं आती ।

यहाँ तक कि ध्वनि – प्रदूषण के प्रभावस्वरूप स्नायुतन्त्र पर कभी – कभी इतना दबाव पड़ जाता है कि पागलपन का रोग उत्पन्न हो जाता है ।

( ङ ) रासायनिक प्रदूषण – प्रायः कृषक अधिक पैदावार के लिए कीटनाशक, शाकनाशक और रोगनाशक दवाइयों तथा रसायनों का प्रयोग करते हैं । इनका स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है । आधुनिक पेस्टीसाइड्स का अन्धाधुन्ध प्रयोग भी लाभ के स्थान पर हानि ही पहुँचा रहा है । जब ये रसायन वर्षा के जल के साथ बहकर नदियों द्वारा सागर में पहुँच जाते हैं तो ये समुद्री जीव – जन्तुओं तथा वनस्पति पर घातक प्रभाव डालते हैं । इतना ही नहीं , किसी – न – किसी रूप में मानव – शरीर भी इनसे प्रभावित होता है ।

4. प्रदूषण पर नियन्त्रण 

पर्यावरण में होने वाले प्रदूषण को रोकने व उसके समुचित संरक्षण के लिए विगत कुछ वर्षों से समस्त विश्व में एक नई चेतना उत्पन्न हुई है ।

औद्योगीकरण से पूर्व यह समस्या इतनी गम्भीर कभी नहीं हुई थी और न इस परिस्थिति की ओर वैज्ञानिकों व अन्य लोगों का उतना ध्यान ही गया था , किन्तु औद्योगीकरण और जनसंख्या दोनों ही की वृद्धि ने संसार के सामने प्रदूषण की गम्भीर समस्या उत्पन्न कर दी है ।

प्रदूषण को रोकने के लिए व्यक्तिगत और सरकारी दोनों ही स्तरों पर प्रयास आवश्यक हैं ।

जल – प्रदूषण के निवारण एवं नियन्त्रण के लिए भारत सरकार ने सन् 1974 ई० से ‘ जल – प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण अधिनियम ‘ लागू किया है । इसके अन्तर्गत एक ‘ केन्द्रीय बोर्ड ‘ व सभी प्रदेशों में ‘ प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड ‘ गठित किए गए हैं। इन बोर्डों ने प्रदूषण नियन्त्रण की योजनाएँ तैयार की हैं तथा औद्योगिक कचरे के लिए भी मानक निर्धारित किए हैं।

उद्योगों के कारण उत्पन्न होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए भारत सरकार ने हाल ही में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय यह लिया है कि नए उद्योगों को लाइसेन्स दिए जाने से पूर्व उन्हें औद्योगिक कचरे के निस्तारण की समुचित व्यवस्था तथा पर्यावरण विशेषज्ञों से स्वीकृति भी प्राप्त करनी होगी ।

इसी प्रकार उन्हें धुएँ तथा अन्य प्रदूषणों के समुचित ढंग से निष्कासन और उसकी व्यवस्था का भी दायित्व लेना होगा। वनों की अनियन्त्रित कटाई को रोकने के लिए कठोर नियम बनाए गए हैं ।

इस बात के प्रयास किए जा रहे हैं कि नए वनक्षेत्र बनाए जाएँ और जनसामान्य को वृक्षारोपण के लिए प्रोत्साहित किया जाए । पर्यावरण के प्रति जागरूकता से ही हम आनेवाले समय में और अधिक अच्छा एवं स्वास्थ्यप्रद जीवन व्यतीत कर सकेंगे और आनेवाली पीढ़ी को प्रदूषण के अभिशाप से मुक्ति दिला सकेंगे ।

7- उपसंहार :

जैसे – जैसे मनुष्य अपनी वैज्ञानिक शक्तियों का विकास करता जा रहा है, pradushan ek samasya बढ़ती जा रही है । विकसित देशों द्वारा वातावरण का प्रदूषण सबसे अधिक बढ़ रहा है ।

यह एक ऐसी समस्या है , जिसे किसी विशिष्ट क्षेत्र या राष्ट्र की सीमाओं में बाँधकर नहीं देखा जा सकता। यह विश्वव्यापी समस्या है, इसलिए सभी राष्ट्रों का संयुक्त प्रयास ही इस समस्या से मुक्ति पाने में सहायक हो सकता है ।

अगर आपको ये लेख Paryavaran Pradushan Par Nibandh पसंद आये तो शेयर जरूर करें |