हिन्दी मे अलंकार : भेद, प्रकार, उदाहरण

हिन्दी मे अलंकार : भेद, प्रकार, उदाहरण

Hindi Mein Alankar

हिन्दी मे अलंकार : भेद, प्रकार, उदाहरण

किसी भी काव्य मे अलंकार आभूषण की तरह होता है | काव्य की शोभा बढ़ानेवाले तत्त्वों को ‘ अलंकार ‘ कहते हैं । हिन्दी काव्य सौंदर्य के तीन तत्व होते हैं, रस, छंद और अलंकार (ras chand alankar) और अलंकार हिन्दी भाषा की कविता का धर्म है |

काव्य को सुन्दरतम बनाने के लिए अनेक उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है । इन उपकरणों में एक अलंकार भी है |

जिस प्रकार मानव अपने शरीर को अलंकृत करने के लिए विभिन्न वस्त्राभूषणादि को धारण करके समाज में गौरवान्वित होता है , उसी प्रकार कवि भी कवितारूपी नारी को अलंकारों से अलंकृत करके गौरव प्राप्त करता है ।

आचार्य दण्डी ने कहा भी है –काव्यशोभाकान धर्मान अलङ्कारान् प्रचक्षते । “

अर्थात् काव्य के शोभाकार धर्म , अलंकार होते हैं । अलंकारों के बिना कवितारूपी नारी विधवा – सी लगती है ।

अलंकारों के महत्त्व का कारण यह भी है कि इनके आधार पर भावाभिव्यक्ति में सहायता मिलती है तथा काव्य रोचक और प्रभावशाली बनता है । इससे अर्थ में भी चमत्कार पैदा होता है तथा अर्थ को समझना सुगम हो जाता है ।

अलंकार के भेद (Alankar ke Bhed)

प्रधान रूप से अलंकार के दो भेद माने जाते हैं –

  1. शब्दालंकार
  2. अर्थालंकार

इन दोनों भेदों का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है ।

 ( अ ) शब्दालंकार –

“ जब कुछ विशेष शब्दों के कारण काव्य में चमत्कार उत्पन्न होता है तो वह ‘ शब्दालंकार ‘ कहलाता है । “

यदि इन शब्दों के स्थान पर उनके ही अर्थ को व्यक्त करनेवाला कोई दूसरा शब्द रख दिया जाए तो वह चमत्कार समाप्त हो जाता है ।

उदाहरणार्थ –

कनक कनक ते सौ गुनी , मादकता अधिकाय ।

वा खाए बौराय जग , या पाए ही बौराय ॥ – बिहारी

यहाँ ‘ कनक ‘ शब्द के कारण जो चमत्कार है , वह पर्यायवाची शब्द रखते ही समाप्त हो जाएगा ।

( ब ) अर्थालंकार –

“ जहाँ काव्य में अर्थगत चमत्कार होता है , वहाँ ‘ अर्थालंकार ‘ माना जाता है । “

इस अलंकार पर आधारित शब्दों के स्थान पर उनका कोई पर्यायवाची रख देने से भी अर्थगत सौन्दर्य में कोई अन्तर नहीं पड़ता ।

उदाहरणार्थ –

चरण – कमल बन्दौं हरिराई ।

यहाँ पर ‘ कमल ‘ के स्थान पर ‘ जलज ‘ रखने पर भी अर्थगत सौन्दर्य में कोई अन्तर नहीं पड़ेगा ।

( अ ) शब्दालंकार

( 1 ) अनुप्रास अलंकार

 

अनुप्रास अलंकार की परिभाषा – वर्णों की आवृत्ति को ‘ अनुप्रास ‘ कहते हैं :

अर्थात ” जहाँ समान वर्गों की बार – बार आवृत्ति होती है वहाँ ‘ अनुप्रास ‘ अलंकार होता है । ‘ ‘

अनुप्रास अलंकार का उदाहरण –

  • तरनि – तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए ।
  • रघुपति राघव राजा राम ।

 स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरणों के अन्तर्गत प्रथम में ‘ त ‘ तथा द्वितीय में ‘ र ‘ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है । –

अनुप्रास अलंकार के भेद – अनुप्रास के पाँच प्रकार हैं –

  1.  छेकानुप्रास
  2.  वृत्यनुप्रास
  3.  श्रुत्यनुप्रास
  4. लाटानुप्रास
  5. अन्त्यानुप्रास ।

इन भेदों का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है-

( 1 ) छेकानुप्रास – जब एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति एक बार होती है , तब ‘ छेकानुप्रास अलंकार होता है।

 उदाहरण –

  • कहत कत परदेसी की बात ।
  • पीरी परी देह , छीनी राजत सनेह भीनी ।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरणों में , प्रथम में ‘ क ‘ वर्ण की तथा द्वितीय में ‘ प ‘ वर्ण की आवृत्ति एक बार हुई है , अत : यहाँ ‘ छेकानुप्रास ‘ अलंकार है ।

 ( 2 ) वृत्यनुप्रास – जहाँ एक वर्ण की अनेक बार आवृत्ति हो , वहाँ ‘ वृत्यनुप्रास ‘ अलंकार होता है ।

उदाहरण –

  • तरनि – तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
  • रघुपति राघव राजा राम।
  • कारी कूर कोकिल कहाँ का बैर काढ़ति री।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरणों में , प्रथम में ‘ त ‘ वर्ण की , द्वितीय में ‘ र ‘ वर्ण की तथा तृतीय उदाहरण में ‘ क ‘ वर्ण की अनेक बार आवृत्ति हुई है ;

अतः यहाँ ‘ वृत्यनुप्रास ‘ अलंकार है ।

( 3 ) श्रुत्यनुप्रास – जब कण्ठ , तालु , दन्त आदि किसी एक ही स्थान से उच्चरित होनेवाले वर्गों की आवृत्ति होती है , तब वहाँ ‘ श्रुत्यनुप्रास ‘ अलंकार होता है ।

उदाहरण –

तुलसीदास सीदत निसिदिन देखत तुम्हारि निठुराई ।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में दन्त्य वर्णों त , द , कण्ठ वर्ण र तथा तालु वर्ण न की आवृत्ति हुई है ।

अतः यहाँ ‘ श्रुत्यनुप्रास ‘ अलंकार है ।

( 4 ) लाटानुप्रास – जहाँ शब्द और अर्थ की आवृत्ति हो ; अर्थात् जहाँ एकार्थक शब्दों की आवत्ति तो हो परन्तु अन्वय करने पर अर्थ भिन्न हो जाए ; वहाँ ‘ लाटानुप्रास ‘ अलंकार होता है ।

उदाहरण –

पूत सूपत तो क्यों धन संचै ?

पूत कपूत तो क्यों धन संचै ?

स्पष्टीकरण- जहां एक से अधिक अर्थ वाले शब्दों की आवृत्ति हो रही है किंतु, अन्वय के कारण अर्थ बदल रहा है,

जैसे पुत्र यदि सपूत हो तो धन संचय की कोई आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि वह स्वयं ही कमा लेगा और यदि पुत्र कपूत है, तो भी धन संचय की आवश्यकता नहीं क्योंकि वह सारे धन को नष्ट कर देगा

( 5 ) अन्त्यानुप्रास – जब छन्द के शब्दों के अन्त में समान स्वर या व्यंजन की आवृत्ति हो , वहाँ ‘ अन्त्यानुप्रास अलंकार होता है ।

उदाहरण :

कहत नटत रीझत खिझत , मिलत खिलत लजियात ।

भरे भौन में करतु हैं , नैननु ही सौं बात ॥

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में , छन्द के शब्दों के अन्त में ‘ त ‘ व्यंजन की आवृत्ति हुई है , अतः यहाँ ‘ अन्त्यानुप्रास ‘ अलंकार है । ‘

( 2 ) यमक अलंकार ( Yamk Alankar )

 

यमक अलंकार की परिभाषा – ‘ यमक ‘ का अर्थ है – ‘ युग्म ‘ या ‘ जोड़ा ‘ । इस प्रकार “ जहाँ एक शब्द अथवा शब्द – समूह का – एक से अधिक बार प्रयोग हो , किन्तु उसका अर्थ प्रत्येक बार भिन्न हो , वहाँ ‘ यमक ‘ अलंकार होता है । ”

उदाहरण –

ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी ,

ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं ।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में ‘ ऊँचे घोर मंदर ‘ के दो भिन्न – भिन्न अर्थ हैं – ‘ महल ‘ और ‘ पर्वत कन्दराएँ ‘

अत : यहाँ ‘ यमक ‘ अलंकार है ।

( 3 ) श्लेष अलंकार

 

श्लेष अलंकार की परिभाषा – जिस शब्द के एक से अधिक अर्थ होते हैं, उसे ‘ श्लिष्ट ‘ कहते हैं । इस प्रकार “ जहाँ किसी शब्द के एक बार प्रयुक्त होने पर एक से अधिक अर्थ होते हों, वहाँ ‘ श्लेष अलंकार’ होता है । ”

 उदाहरण:

रहिमन पानी राखिए , बिन पानी सब सून ।

पानी गए न ऊबरे , मोती मानुष चून ॥

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में तीसरी बार प्रयुक्त ‘ पानी ‘ शब्द श्लिष्ट है और यहाँ इसके तीन अर्थ हैं – चमक ( मोती के पक्ष में ) , प्रतिष्ठा ( मनुष्य के पक्ष में ) तथा जल ( आटे के पक्ष में ) ;

अत : यहाँ ‘ श्लेष ‘ अलंकार है । ‘ |

( ब ) अर्थालंकार |

( 4 ) उपमा  अलंकार

 

उपमा अलंकार की परिभाषा – ‘ उपमा ‘ का अर्थ है – सादृश्य , समानता तथा तुल्यता । “ जहाँ पर उपमेय की उपमान से किसी समान धर्म के आधार पर समानता या तुलना की जाए , वहाँ ‘ उपमा अलंकार होता है ।

उपमा अलंकार के अंग – उपमा अलंकार के चार अंग हैं-

  1. उपमेय – जिसकी उपमा दी जाए ।
  2. उपमान – जिससे उपमा दी जाए ।
  3. समान ( साधारण ) धर्म – उपमेय और उपमान दोनों से समानता रखनेवाले धर्म ।
  4. वाचक शब्द – उपमेय और उपमान की समानता प्रदर्शित करनेवाला सादृश्यवाचक शब्द ।

उदाहरण –

मुख मयंक सम मंजु मनोहर ।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में ‘ मुख ‘ उपमेय , ‘ मयंक ‘ उपमान , ‘ मंजु और मनोहर ‘ साधारण धर्म तथा ‘ सम ‘ वाचक शब्द है ;

अत : यहाँ ‘ उपमा ‘ अलंकार का पूर्ण परिपाक हुआ है ।

उपमा अलंकार के भेद – उपमा अलंकार के प्रायः चार भेद किए जाते हैं —

  1. पूर्णोपमा
  2. लुप्तोपमा
  3. रसनोपमा
  4. मालोपमा ।

उपमा अलंकार के भेदों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है-

( क ) पूर्णोपमा – पूर्णोपमा अलंकार में उपमा के चारों अंग उपमान , उपमेय , साधारण धर्म और वाचक शब्द स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट होते हैं ।

उदाहरण –  पीपर पात सरिस मन डोला ।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में उपमा के चारों अंग उपमान ( पीपर पात ) , उपमेय ( मन ) , साधारण धर्म ( डोला ) तथा वाचक शब्द ( सम ) स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट हैं ; अत : यहाँ ‘ पूर्णोपमा ‘ अलंकार है ।

( ख ) लुप्तोपमा – “ उपमेय , उपमान , साधारण धर्म तथा वाचक शब्द में से किसी एक या अनेक अंगों के लुप्त होने पर ‘ लुप्तोपमा ‘ अलंकार होता है । ” लुप्तोपमा अलंकार में उपमा के तीन अंगों तक के लोप की कल्पना की गई है ।

उदाहरण – नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन ।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में ‘ नयन ‘ उपमेय , “ सरोरुह और बारिज ‘ उपमान तथा ‘ नील और अरुण ‘ साधारण धर्म हैं । ‘ समान ‘ आदिवाचक शब्द का लोप हुआ है ; अतः यहाँ ‘ लुप्तोपमा ‘ अलंकार है ।

( ग ) रसनोपमा – जिस प्रकार एक कडी दसरी कड़ी से क्रमश : जडी रहती है , उसी प्रकार “ रसनोपमा अलंकार में उपमेय – उपमान एक – दूसरे से जुड़े रहते हैं । ”

उदाहरण – सगुन ज्ञान सम उद्यम , उद्यम सम फल जान । . फल समान पुनि दान है , दान सरिस सनमान ॥

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में ‘ उद्यम ‘ , ‘ फल ‘ . ‘ दान ‘ और ‘ सनमान ‘ उपमेय अपने उपमानों के साथ श्रृंखलाबद्ध रूप में प्रस्तुत किए गए हैं ; अतः यहाँ ‘ रसनोपमा ‘ अलंकार है ।

( घ ) मालोपमा – मालोपमा का तात्पर्य है – माला के रूप में उपमानों की श्रृंखला । “ एक ही उपमेय के लिए जब अनेक उपमानों का गुम्फन किया जाता है , तब ‘ मालोपमा ‘ अलंकार होता है । ”

उदाहरण – पछतावे की परछाँही – सी , तुम उदास छाई हो कौन ? दुर्बलता की अंगड़ाई – सी , अपराधी – सी भय से मौन ।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में एक उपमेय के लिए अनेक उपमान प्रस्तुत किए गए हैं ; अत : यहाँ ‘ मालोपमा ‘ अलंकार है । ‘

( 5 ) रूपक अलंकार 

 

परिभाषा – ” जहां उपमेय में उपमान का भेदरहित आरोप हो वहाँ रूपक अलंकार होता है । रूपक अलंकार में उपमेय और उपमान में कोई भेद नहीं रहता । ।

रूपक अलंकार का उदाहरण-

ओ चिंता की पहली रेखा ,

अरे विश्व – वन की व्याली ।

ज्वालामुखी स्फोट के भीषण ,

प्रथम कम्प – सी मतवाली ।

स्पष्टीकरण – उपयुक्त उदाहरण में चिन्ता उपमेय में विश्व – वन की व्याली आदि उपमानो का आरोप किया गया है, अत : यहाँ ‘ रूपक ‘ अलंकार है ।

रूपक के भेद – आचार्यों ने रूपक के अनगिनत भेट – उपभेद किए हैं : किन्तु इसके तीन प्रधान भेद इस प्रकार हैं –

  1. सांगरूपक
  2. निरंग रूपक
  3. परम्परित रूपक ।

इनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है

( 1 ) सांगरूपक – जहाँ अवयवोंसहित उपमान का आरोप होता है , वहाँ ‘ सांगरूपक अलंकार होता है ।

उदाहरण –

रनित भुंग – घंटावली , झरति दान मधु – नीर ।

मंद – मंद आवत चल्यौ , कुंजर कुंज – समीर ॥

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में समीर में हाथी का , भंग में घण्टे का और मकरन्द में दान ( मद – जल ) का आरोप किया गया है । इस प्रकार वायु के अवयवों पर हाथी का आरोप होने के कारण यहाँ ‘ सांगरूपक ‘ अलंकार है |

( ख ) निरंग रूपक – जहाँ अवयवों से रहित केवल उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप होता है , वहाँ ‘ निरंग रूपक अलंकार होता है । ।

उदाहरण –

इस हृदय – कमल का घिरना , अलि – अलकों की उलझन में ।

आँसू मरन्द का गिरना , मिलना निःश्वास पवन में ।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में हृदय ( उपमेय ) पर कमल ( उपमान ) का अलकों ( उपमेय ) पर अलि ( उपमान ) का : आँसू ( उपमेय ) पर मरन्द ( उपमान ) का तथा नि : श्वास ( उपमेय ) पर पवन ( उपमान ) का आरोप किया गया है ; अतः यहाँ ‘ निरंग रूपक ‘ अलंकार है ।

( ग ) परम्परित रूपक – जहाँ उपमेय पर एक आरोप दूसरे आरोप का कारण होता है , वहाँ ‘ परम्परित रूपक ‘ अलंकार है ।

उदाहरण-

बाडव – ज्वाला सोती थी , इस प्रणय – सिन्धु के तल में ।

प्यासी मछली – सी आँखें , थीं विकल रूप के जल में ।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में आँखों ( उपमेय ) पर मछली ( उपमान ) का आरोप , रूप ( उपमेय ) पर न ) के आरोप के कारण किया गया है : अत : यहाँ ‘ परम्परित रूपक ‘ अलंकार है । ‘

रूपक के अन्य  से उदाहरण –

  • सेज नागिनी फिरि फिरि डसी । ।
  • बिरह क आगि कठिन अति मन्दी ।
  • कमल – नैन को छाँड़ि महातम , और देव को ध्यावै ।
  • आपुन पौढ़ि अधर सज्जा पर , कर – पल्लव पलुटावति ।
  • बिधि कुलाल कीन्हे काँचे घट । । ।
  • महिमा मृगी कौन सुकृती की खल – बच बिसिखन बाँची ?

( 6 ) उत्प्रेक्षा अलंकार 

 

परिभाषा – “ जहाँ उपमेय में उपमान की सम्भावना की जाती है , वहाँ ‘ उत्प्रेक्षा ‘ अलंकार होता है । ”

उत्प्रेक्षा को व्यक्त करने के लिए प्रायः मनु , मनहँ , मानो , जानेह . जानो आदि वाचक शब्दों का प्रयोग किया जाता है ।

उत्प्रेक्षा अलनकर का उदाहरण-

सोहत ओढ़े पीतु पटु , स्याम सलोने गात ।

मनौ नीलमनि – सैल पर , आतपु पर्यो प्रभात ॥

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में श्रीकृष्ण के श्याम शरीर ( उपमेय ) पर नीलमणियों के पर्वत ( उपमान ) की तथा पीत – पट ( उपमेय ) पर प्रभात की धूप ( उपमान ) की सम्भावना की गई है ; अत : यहाँ ‘ उत्प्रेक्षा ‘ अलंकार है ।

उत्प्रेक्षा के भेद – उत्प्रेक्षा के तीन प्रधान भेद हैं –

  1. वस्तूत्प्रेक्षा ,
  2. हेतृत्प्रेक्षा ,
  3. फलोत्प्रेक्षा ।

इनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है –

( क ) वस्तूत्प्रेक्षा – वस्तूत्प्रेक्षा में एक वस्तु की दूसरी वस्तु के रूप में सम्भावना की जाती है ।

( संकेत – उत्प्रेक्षा के प्रसंग में दिया गया उपर्युक्त उदाहरण वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार पर ही आधारित है । )

( ख ) हेतूत्प्रेक्षा – जहाँ अहेतु में हेतु मानकर सम्भावना की जाती है , वहाँ ‘ हेतृत्प्रेक्षा ‘ अलंकार होता है ।

उदाहरण –

मानहुँ बिधि तन – अच्छ छबि , स्वच्छ राखिबै काज ।

दृग – पग पौंछन कौं करे , भूषन पायन्दाज ।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में हेतु ‘ आभूषण ‘ न होने पर भी उसकी पायदान के रूप में उत्प्रेक्षा की गई है , अतः यहाँ ‘ हेतृत्प्रेक्षा ‘ अलंकार है ।

( ग ) फलोत्प्रेक्षा – जहाँ अफल में फल की सम्भावना का वर्णन हो , वहाँ ‘ फलोत्प्रेक्षा ‘ अलंकार होता है ।

उदाहरण –

पुहुप सुगन्ध करहिं एहि आसा ।

मकु हिरकाइ लेइ हम्ह पासा । ।

स्पष्टीकरण – पुष्पों में स्वाभाविक रूप से सुगन्ध होती है , परन्तु यहाँ जायसी ने पुष्पों की सुगन्ध विकीर्ण होने का ‘ फल ‘ बताया है । कवि का तात्पर्य यह है कि पुष्प इसलिए सुगन्ध विकीर्ण करते हैं कि सम्भवतः पदमावती उन्हें अपनी नासिका से लगा ले ।

इस प्रकार उपर्युक्त उदाहरण में अफल में फल की सम्भावना की गई है ; अतः यहाँ ‘ फलोत्प्रेक्षा ‘ अलंकार है ।

( 7 ) प्रतीप अलंकार 

 

परिभाषा – ‘ प्रतीप ‘ शब्द का अर्थ है ‘ विपरीत ‘ । इस अलंकार में उपमा अलंकार से विपरीत स्थिति होती है ; अर्थात् “ जहाँ उपमान का अपकर्ष वर्णित हो , वहाँ ‘ प्रतीप ‘ अलंकार होता है । ” प्रसिद्ध उपमान को उपमेय रूप में कल्पित किया जा सकता है ।

उदाहरण –

देत मुकुति सुन्दर हरषि , सुनि परताप उदार ।

है तेरी तरवार – सी , कालिंदी की धार ॥

स्पष्टीकरण – प्राय : तलवार की धार की तुलना नदी की तेज धार से की जाती है ; किन्तु यहाँ कालिन्दी की धार ( उपमान ) को तलवार की धार ( उपमेय ) के समान बताया गया है ; अत : उपर्युक्त उदाहरण में प्रसिद्ध उपमान का अपकर्ष होने के कारण ‘ प्रतीप ‘ अलंकार है ।

( 8 ) भ्रान्तिमान् अलंकार 

 

परिभाषा – जहाँ समानता के कारण एक वस्तु में किसी दूसरी वस्तु का भ्रम हो , वहाँ ‘ भ्रान्तिमान् ‘ अलंकार होता है ।

उदाहरण –

( क )

पांय महावर देन को , नाइन बैठी आय ।

फिरि – फिरि जानि महावरी , एड़ी मीडति जाय ॥

( ख )

नाक का मोती अधर की कान्ति से ,

बीज दाडिम का समझकर भ्रान्ति से ।

देख उसको ही हुआ शुक मौन है ,

सोचता है अन्य शुक यह कौन है ?

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त प्रथम उदाहरण में लाल एडी ( उपमेय ) और महावर ( उपमान ) में लाल रंग की समानता के कारण नाइन को भ्रम उत्पन्न हो गया है

तथा द्वितीय उदाहरण में तोता उर्मिला को नाक के मोती को भ्रमवश अनार का दाना और उसकी नाक को दसरा तोता समझकर भ्रमित हो जाता है ; अतः यहाँ ‘ भ्रान्तिमान् अलंकार है ।

( 9 ) सन्देह अलंकार 

 

परिभाषा – जहाँ एक वस्तु के सम्बन्ध में अनेक वस्तुओं का सन्देह हो और समानता के कारण अनिश्चय की मनोदशा बनी रहे , वहाँ ‘ सन्देह ‘ अलंकार होता है ।

उदाहरण-

कैधौं ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु ,

बीर – रस बीर तरवारि सी उधारी है ।

तुलसी सुरेस चाप , कैंधौं दामिनी कलाप ,

कैंधों चली मेरु तें कृसानु – सरि भारी है । 

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में लंका – दहन के वर्णन में हनुमानजी की जलती पूँछ को देखकर लंकावासियों को यह निश्चित ज्ञान नहीं हो पाता कि

यह हनुमान की जलती हुई पूँछ है या आकाश – मार्ग में अनेक पुच्छल तारे भरे हैं, अथवा वीर रसरूपी वीर ने तलवार निकली है, या यह इन्द्रधनुष है अथवा यह बिजली की तड़क है , या यह सुमेरु पर्वत से अग्नि की सरिता बह चली है ; अत : यहाँ ‘ सन्देह ‘ अलंकार है ।

 

( 10 ) दृष्टान्त अलंकार 

 

परिभाषा – “ जहाँ उपमेय , उपमान के साधारण धर्म में भिन्नता होते जहा उपमय , उपमान के साधारण धर्म में भिन्नता होते हए भी बिम्ब – प्रतिबिम्ब भाव से कथन किया जाए , वहाँ ‘ दृष्टान्त ‘ अलंकार होता है । ”  इसमें प्रथम पंक्ति का प्रतिबिम्ब द्वितीय पंक्ति में झलकता है ।

उदाहरण –

दुसह दुराज प्रजान को, क्यों न बढ़े दुःख – द्वंद ।

अधिक अँधेरो जग करत , मिलि मावस रवि – चंद ॥ 

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में प्रथम पंक्ति उपमेय वाक्य है तथा दूसरी पंक्ति उपमान वाक्य है ; अर्थात् प्रथम पंक्ति का प्रतिबिम्ब द्वितीय पंक्ति में झलकता है । अतः यहाँ ‘ दृष्टान्त ‘ अलंकार है ।

( 11 ) अतिशयोक्ति अलंकार 

 

परिभाषा – जहाँ किसी वस्तु , घटना अथवा परिस्थिति की वास्तविकता का बढ़ा – चढ़ाकर वर्णन किया जाता है , वहाँ ‘ अतिशयोक्ति ‘ अलंकार होता है ।

उदाहरण –

छाले परिबे कैं डरनु , सकै न हाथ छुबाइ ।

झझकत हिमैं गुलाब कैं , हवा झैवैयत पाइ ॥

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदहारण में नायिका के पाँवों की सुकुमारता का बहुत बढ़ा – चढ़ाकर वर्णन किया गया है , अत : यहाँ ‘ अतिशयोक्ति अलंकार है ।

( 12 ) अनन्वय अलंकार 

 

परिभाषा – जहाँ उपमान के अभाव के कारण उपमेय ही उपमान का स्थान ले लेता है , वहाँ ‘ अनन्वय ‘ अलंकार होता है ।

उदाहरण-

राम – से राम , सिया – सी सिया , सिरमौर बिरंचि बिचारि सँवारे ।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में राम और सीता ही उपमान हैं तथा राम और सीता ही उपमेय ; अत : यहाँ ‘ अनन्वय ‘ अलंकार है । |

प्रमुख अलंकार – युग्मों में अन्तर 

( 1 ) यमक और श्लेष अलंकार मे अंतर 

 

  • ‘ यमक ‘ में एक शब्द एक से अधिक बार प्रयुक्त होता है और प्रत्येक स्थान पर उसका अलग अर्थ होता है ;

जैसे-  नगन जड़ाती थीं वे नगन जड़ाती हैं । 

( यहाँ दोनों स्थान पर ‘ नगन ‘ शब्द के अलग – अलग अर्थ हैं – नग ( रत्न ) और नग्न । )

  • किन्तु ‘ श्लेष ‘ में एक शब्द के एक बार प्रयुक्त होने पर भी अनेक अर्थ होते हैं ;

जैसे को घटि ये वृषभानुजा वे हलधर के वीर

यहाँ वृषभानुजा के अर्थ हैं – वृषभानु + जा अर्थात् वृषभानु की पुत्री राधा तथा वृषभ + अनुजा अर्थात् वृषभ की बहन गाय । हलधर के अर्थ है – हल को धारण करनेवाला बलराम तथा बैल ।

( 2 ) उपमा और उत्प्रेक्षा मे अंतर 

 

  • ‘ उपमा ‘ में उपमेय की उपमान से समानता बताई जाती है ;

जैसे – पीपर पात सरिस मन डोला 

यहाँ मन की तुलना पीपल के पत्ते से की गई है ।

  • किन्तु ‘ उत्प्रेक्षा ‘ में उपमेय में उपमान की सम्भावना प्रकट की जाती है ।

जैसे सोहत ओढे पीतु पटु , स्याम सलोने गात ।  मनौ नीलमनि – सैल पर , आतपु पर्यो प्रभात ।

यहाँ पर ‘ पीतु पटु ‘ में प्रभात की धूप की तथा श्रीकृष्ण के सलोने शरीर में नीलमणि के पर्वत की सम्भावना की गई है ।

( 3 ) उपमा और रूपक अलंकार मे अंतर 

 

  • ‘ उपमा ‘ में उपमेय की उपमान से समानता बताई जाती है ;

जैसे पीपर पात सरिस मन डोला ।

यहाँ मन की तुलना पीपल के पत्ते से की गई है ।

  • किन्तु ‘ रूपक ‘ में उपमेय में उपमान का भेदरहित आरोप किया जाता है ।

जैसे चरन – कमल बंदी हरिराई ।

यहाँ पर चरणों पर कमल का भेदरहित आरोप किया गया है ।

( 4 ) सन्देह और भ्रान्तिमान अलंकार मे अंतर

 

  • ‘ सन्देह ‘ में उपमेय में उपमान का सन्देह रहता है

जैसे – रस्सी है या साँप ।

  • किन्तु ‘ भ्रान्तिमान् ‘ में उपमेय का ज्ञान नहीं रहता और भ्रमवश एक को दूसरा समझ लिया जाता है ।

जैसे रस्सी नहीं , साँप है । इसके अतिरिक्त ‘ सन्देह ‘ में निरन्तर सन्देह बना रहता है और निश्चय नहीं हो पाता . किन्तु ‘ भ्रान्तिमान ‘ में भ्रम निश्चय में बदल जाता है ।

अंतिम शब्द –

इस पुरे लेख मे हमने विस्तृत रूप से हिन्दी में अलंकार (hindi mein alankar ) किसे कहते हैं, अलंकार के भेद कितने होते हैं, अलंकार के प्रकार पर चर्चा की है | ये पूरा लेख भर्ती परीक्षाओं तथा कक्षा 5,6,7,8,9,10,11,12 आदि के लिए भी बहुत महातपूर्ण है |

रस क्या है, रस का स्थायी भाव, रस के कितने भेद होते हैं ?

रस क्या है, रस का स्थायी भाव, रस के कितने भेद होते हैं ?

What is Ras in Hindi Grammar

रस क्या है, रस का  स्थायी भाव, रस के कितने भेद होते हैं ?

प्रश्न – रस क्या है ? उसके अवयवों पर प्रकाश डालिए । अथवा रस की परिभाषा देते हुए उसके विभिन्न अंगों पर प्रकाश डालिए। ( what is ras in Hindi grammar )

उत्तर-  संस्कृत में ‘रस’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘ रसस्यते असो इति रसाः ‘ के रूप में की गई है ; अर्थात् जिसका आस्वादन किया जाए, वही रस है ; परन्तु साहित्य में काव्य को पढ़ने , सुनने या उस पर आधारित अभिनय देखने से जो आनन्द प्राप्त होता है , उसे ‘ रस ‘ कहते हैं ।

रस हिन्दी व्याकरण का बहुत ही महत्वपूर्ण अवयव है, हिन्दी मे रस का प्रयोग ‘काव्य के सौंदर्य’ को बढ़ाने के लिए प्रयोग किया जाता है | काव्य सौन्दर्य के तीन तत्व होते हैं, रस, छंद और अलंकार (Ras, Chhand alankar )

सर्वप्रथम भरतमुनि ने अपने ‘ नाट्यशास्त्र ‘ में रस के स्वरूप को स्पष्ट किया था । रस की निष्पत्ति के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है –

” विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः। “

अर्थात् विभाव , अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है । इस प्रकार काव्य पढ़ने , सुनने या अभिनय देखने पर विभाव आदि के संयोग से उत्पन्न होनेवाला आनन्द ही ‘ रस ‘ है।

काव्य में रस का वही स्थान है , जो शरीर में आत्मा का है । जिस प्रकार आत्मा के अभाव में प्राणी का अस्तित्व सम्भव नहीं है , उसी प्रकार रसहीन कथन को काव्य नहीं कहा जा सकता । इस प्रकार रस ‘ काव्य की आत्मा ‘ है।

रस के अंग ( अवयव )

रस के प्रमुख अंग निम्नलिखित हैं-

( क ) स्थायी भाव ,      ( ख ) विभाव ,

( ग ) अनुभाव ,        ( घ ) संचारी अथवा व्यभिचारी भाव।

हिन्दी के रस के विभिन्न अंगों का विवेचन इस प्रकार किया जा सकता है-

( क ) स्थायी भाव-

अर्थ स्थायी भाव प्रत्येक सहृदय व्यक्ति के हृदय में हमेशा विद्यमान रहते हैं । यद्यपि वे सुप्त अवस्था में रहते हैं , तथापि उचित अवसर पर जाग्रत एवं पुष्ट होकर ये रस के रूप में परिणत हो जाते हैं ।

स्थायी भाव एवं उनसे सम्बन्धित रस – एक स्थायी भाव का सम्बन्ध एक रस से होता है । इनकी संख्या नौ है, किन्तु कुछ आचार्यों ने इनकी संख्या ग्यारह निर्धारित की है ।

ये ग्यारह स्थायी भाव और इनसे सम्बन्धित रसों के नाम इस प्रकार हैं-

 

 

types of ras in hindi रस और उसके स्थायी भाव

 

इनमें अन्तिम दो स्थायी भावों ( वत्सलता तथा देवविषयक रति ) को श्रृंगार के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया ‘ है ।

प्रत्येक स्थायी भाव का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है

( 1 ) रति – स्त्री – पुरुष की एक – दूसरे के प्रति उत्पन्न प्रेम नामक चित्तवृत्ति को ‘ रति ‘ स्थायी भाव कहते हैं ।

( 2 ) हास – रूप, वाणी एवं अंगों के विकारों को देखने से चित्त का विकसित होना ‘ हास ‘ कहलाता है ।

( 3 ) शोक – प्रिय वस्तु ( इष्टजन, वैभव आदि ) के नाश इत्यादि के कारण उत्पन्न होनेवाली चित्त की व्याकुलता को ‘ शोक ‘ कहते हैं ।

( 4 ) क्रोध – असाधारण अपराध, विवाद , उत्तेजनापूर्ण अपमान आदि से उत्पन्न मनोविकार को ‘ क्रोध ‘ कहते हैं ।

( 5 ) उत्साह – मन की वह उल्लासपूर्ण वृत्ति, जिसके द्वारा मनुष्य तेजी के साथ किसी कार्य को करने में लग जाता है, ‘ उत्साह ‘ कहलाती है । इसकी अभिव्यक्ति शक्ति, शौर्य एवं धैर्य के प्रदर्शन में होती है ।

( 6 ) भय – हिंसक जन्तुओं के दर्शन, अपराध, भयंकर शब्द, विकृत चेष्टा और रौद्रः आकृति द्वारा उत्पन्न मन की व्याकुलता को ही ‘भय’ स्थायी भाव के रूप में परिभाषित किया जाता है ।

( 7 ) आश्चर्य – अलौकिक वस्तु को देखने, सुनने या स्मरण करने से उत्पन्न मनोविकार ‘आश्चर्य ‘ कहलाता है ।

( 8 ) जुगुप्सा किसी अरुचिकर या मन के प्रतिकूल वस्तु को देखने अथवा उसकी कल्पना करने से जो भाव उत्पन्न होता है , वह ‘ जुगुप्सा ‘ कहलाता है ।

( 9 ) निर्वेद – सांसारिक विषयों के प्रति वैराग्य की उत्पत्ति ‘ निर्वेद ‘ कहलाती है ।

( 10 ) वत्सलता – माता – पिता का सन्तान के प्रति अथवा भाई – बहन का परस्पर सात्त्विक प्रेम ही ‘ वत्सलता ‘ कहलाता है ।

( 11 ) देव विषयक रति – ईश्वर में परम अनुरक्ति ही ‘ देव – विषयक रति ‘ कहलाती है ।

रस – निष्पत्ति में स्थायी भाव का महत्त्व – स्थायी भाव ही परिपक्व होकर रस – दशा को प्राप्त होते हैं ; इसलिए रस – निष्पत्ति में स्थायी भाव का सबसे अधिक महत्त्व है । अन्य सभी भाव और कार्य स्थायी भाव की पुष्टि के लिए ही होते हैं ।

( ख ) विभाव

अर्थ – जो कारण ( व्यक्ति , पदार्थ आदि ) दूसरे व्यक्ति के हृदय में स्थायी भाव को जाग्रत तथा उद्दीप्त करते हैं , उन्हें ‘ विभाव ‘ कहते हैं ।

विभाव के भेद – ‘ विभाव ‘ आश्रय के हृदय में भावों को जाग्रत करते हैं और उन्हें उद्दीप्त भी करते हैं । इस आधार पर विभाव के निम्नलिखित दो भेद हैं

( 1 ) आलम्बन विभाव – जिस व्यक्ति अथवा वस्तु के कारण कोई भाव जाग्रत होता है , उस व्यक्ति अथवा . वस्तु को उस भाव का ‘ आलम्बन विभाव ‘ कहते हैं ।

( 2 ) उद्दीपन विभाव – स्थायी भावों को उद्दीप्त तथा तीव्र करनेवाला कारण ‘ उद्दीपन विभाव ‘ कहलाता है । आलम्बन की चेष्टा तथा देश – काल आदि को ‘ उद्दीपन विभाव ‘ माना जाता है ।

रस – निष्पत्ति में विभाव का महत्त्व – हमारे मन में रहनेवाले स्थायी भावों को जाग्रत करने तथा उद्दीप्त करने का कार्य विभाव द्वारा होता है । जाग्रत तथा उद्दीप्त स्थायी भाव ही रस का रूप प्राप्त करते हैं । इस प्रकार रस – निष्पत्ति में विभाव का अत्यधिक महत्त्व है ।

( ग ) अनुभाव

अर्थ – आश्रय की चेष्टाओं अथवा रस की उत्पत्ति को पुष्ट करने वाले वे भाव, जो विभाव के बाद उत्पन्न होते हैं ‘अनुभाव‘ कहलाते हैं । भावों को सूचना देने के कारण ये भावों के ‘ अनु ‘ अर्थात् पश्चातवर्ती माने जाते हैं। अनुभाव के भेद – अनुभावों के मुख्य रूप से निम्नलिखित चार भेद किए गए हैं,

  1. कायिक अनुभाव – प्राय : शरीर की कृत्रिम चेष्टा को ‘ कायिक अनुभाव ‘ कहा जाता है।
  2. मानसिक अनुभाव – मन में हर्ष – विषाद आदि के उद्वेलन को ‘ मानसिक अनुभाव ‘ कहते हैं।
  3. आहार्य अनुभाव – मन के भावों के अनुसार अलग – अलग प्रकार की कृत्रिम वेश – रचना करने को ‘ आहार्य अनुभाव ‘ कहते हैं।
  4. सात्त्विक अनुभाव – हेमचन्द्र के अनुसार ‘ सत्त्व ‘ का अर्थ है ‘ प्राण ‘ । स्थायी भाव ही प्राण तक पहुँचकर ‘ सात्त्विक अनुभाव ‘ का रूप धारण कर लेते हैं।

रस – निष्पत्ति में अनुभावों का महत्त्व- स्थायी भाव जाग्रत और उद्दीप्त होकर रस – दशा को प्राप्त होते हैं । अनभावों के द्वारा इस बात का ज्ञान होता है कि आश्रय के हृदय में रस की निष्पत्ति हो रही है अथवा नहीं । इसके साथ ही अनुभावों का चित्रण काव्य को उत्कृष्टता प्रदान करता है ।

( घ ) संचारी अथवा व्यभिचारी भाव

अर्थ – जो भाव , स्थायी भावों को अधिक पुष्ट करते हैं, उन सहयोगी भावों को ‘ संचारी भाव ‘ कहा जाता है ।

भरतमुनि ने संचारी भावों का स्पष्टीकरण करते हुए कहा है कि ये

“वे भाव हैं , जो रसों में अनेक प्रकार से विचरण करते हैं तथा रसों को पुष्ट कर आस्वादन के योग्य बनाते हैं । जिस प्रकार समुद्र में लहरें उत्पन्न होती हैं और उसी में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार स्थायी भाव में संचारी भाव उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं।”

संचारी भावों के भेद – आचार्यों ने संचारी भावों की संख्या 33 निश्चित की है , जिनके नाम इस प्रकार हैं

  1. निर्वेद
  2. आवेग
  3. दैन्य
  4.  श्रम
  5.  मद
  6. जड़ता
  7. उग्रता
  8.  मोह
  9.  विबोध
  10.  स्वप्न
  11.  अपस्मार
  12.  गर्व
  13. मरण
  14. आलस्य
  15. अमर्ष
  16. निद्रा
  17. अवहित्था
  18. उत्सुकता
  19. उन्माद
  20. शंका
  21. स्मृति
  22.  मति
  23. व्याधि
  24. सन्त्रास
  25. लज्जा
  26. हर्ष
  27. असूया
  28. विषाद
  29. धृति
  30. चपलता
  31. ग्लानि
  32. चिन्ता
  33. वितर्क

रस – निष्पत्ति में संचारी भावों का महत्त्व – संचारी भाव स्थायी भाव को पुष्ट करते हैं | वे  स्थायी भावों को योग्य बनाते हैं कि उनका आस्वादन किया जा सके । यद्यपि वे स्थायी भाव को किया जा सके । यद्यपि वे स्थायी भाव को पुष्ट कर स्वयं समाप्त हो जाते हैं , तथापि ये स्थायी भाव को गति एवं व्यापकता प्रदान करते हैं ।

रसों का सामान्य परिचय (Intoduction of types of ras in hindi)

( 1 ) श्रृंगार रस 

( क ) अर्थ – नायक और नायिका के मन में संस्कार रूप में स्थित रति या प्रेम जब रस की अवस्था को पहुँचकर आस्वादन के योग्य हो जाता है तो वह ‘श्रृंगार रस ‘ कहलाता है ।

( ख ) उपकरण :

  1. स्थायी भाव – रति ।
  2. आलम्बन विभाव – नायक और नायिका ।
  3. उद्दीपन विभाव – आलम्बन का सौन्दर्य , प्रकृति , रमणीक उपवन , वसन्त – ऋतु , चाँदनी , भ्रमर – गुंजन , पक्षियों का कूजन आदि ।
  4. अनुभाव – अवलोकन , स्पर्श , आलिंगन , कटाक्ष , अश्रु आदि ।
  5. संचारी भाव – हर्ष , जड़ता , निर्वेद , अभिलाषा , चपलता , आशा , स्मृति , रुदन , आवेग , उन्माद आदि ।
  6. श्रृंगार के भेद – शृंगार के दो भेद हैं – संयोग शृंगार तथा वियोग या विप्रलम्भ शृंगार । इनका विवेचन निम्नलिखित है
  7. संयोग श्रृंगार – संयोगकाल में नायक और नायिका की पारस्परिक रति को ‘ संयोग शृंगार ‘ कहा जाता है । यहाँ संयोग का अर्थ है – सुख की प्राप्ति करना ।

श्रृंगार रस का उदाहरण :

दूलह श्रीरघुनाथ बने दुलही सिय सुन्दर मन्दिर माहीं ।

गावति गीत सबै मिलि सुन्दरि बेद जुवा जुरि बिप्र पढ़ाहीं ॥

राम को रूप निहारति जानकि कंकन के नग की परछाहीं । ।

यातें सबै सुधि भूलि गई कर टेकि रही , मल टारत नाहीं । । – तुलसीदास

स्पष्टीकरण – इस पद में स्थायी भाव ‘ रति ‘ है । ‘ राम ‘ आलम्बन ,’ सीता ‘ आश्रय , नग में पड़नेवाला राम का प्रतिबिम्ब  उद्दीपन , ‘ उस प्रतिबिम्ब को देखना, हाथ टेकना ‘ अनुभाव तथा ‘ हर्ष एवं जड़ता संचारी भाव हैं । अत : इस पद में संयोग श्रृंगार है ।

ii ) वियोग या विप्रलम्भ श्रृंगार – एक – दूसरे के प्रेम में अनुरक्त नायक एवं नायिका के मिलन के अभाव को ‘ विप्रलम्भ श्रृंगार ‘ कहा जाता है ।

उदाहरण :

रे मन आज परीक्षा तेरी !

सब अपना सौभाग्य मनावें ।

दरस परस निःश्रेयस पावें ।

उद्धारक चाहें तो आवें ।

यहीं रहे यह चेरी ! –   मैथिलीशरण गुप्त

स्पष्टीकरण – इसमें स्थायी भाव ‘ रति ‘ है । ‘ यशोधरा ‘ आलम्बन है । उद्धारक गौतम के प्रति यह भाव कि वे चाहें तो आवें ‘ उद्दीपन विभाव है । ‘ मन को समझाना और उद्बोधन ‘ अनुभाव है , ” यशोधरा का प्रणय ‘ मान है तथा मति , वितर्क और अमर्ष संचारी भाव हैं ; अतः इस छन्द में विप्रलम्भ श्रृंगार है ।

( 2 ) करुण रस 

( क ) अर्थ – बन्धु – विनाश , बन्धु – वियोग , द्रव्यनाश और प्रेमी के सदैव के लिए बिछुड़ जाने से करुण रस – उत्पन्न होता है । यद्यपि दुःख का अनुभव वियोग शृंगार में भी होता है , तथापि वहाँ मिलने की आशा भी बँधी रहती है । अतएव जहाँ पर मिलने की आशा पूरी तरह समाप्त हो जाती है , वहाँ ‘ करुण रस होता है ।

( ख ) उपकरण :

  1.  स्थायी भाव – शोक ।
  2.  आलम्बन विभाव – विनष्ट व्यक्ति अथवा वस्तु
  3.  उद्दीपन विभाव – आलम्बन का दाहकर्म, इष्ट के गुण तथा उससे सम्बन्धित वस्तुएँ एवं इष्ट के चित्र का वर्णन ।
  4. अनुभाव – भूमि पर गिरना , नि : श्वास . छाती पीटना , रुदन , प्रलाप , मूर्छा , दैवनिन्दा , कम्प आदि ।
  5. संचारी भाव – निर्वेद , मोह , अपस्मार , व्याधि , ग्लानि , स्मृति , श्रम , विषाद , जड़ता , दैन्य , उन्माद आदि ।

उदाहरण

अभी तो मुकुट बँधा था माथ ,

हुए कल ही हल्दी के हाथ ,

खुले भी न थे लाज के बोल ,

खिले थे चुम्बन शून्य कपोल ,

हाय रुक गया यहीं संसार ,

बना सिंदूर अनल अंगार ,

वातहत लतिका वह सुकुमार ,

पड़ी है छिन्नाधार ! – सुमित्रानन्दन पन्त

स्पष्टीकरण – इन पंक्तियों में ‘ विनष्ट पति ‘ आलम्बन तथा ‘ मुकुट का बँधना’, हल्दी के हाथ होना, लाज के बोलों का न खुलना ‘ आदि उद्दीपन हैं ।

‘वायु से आहत लतिका के समान नायिका का बेसहारे पड़े होना ‘ अनुभाव है तथा उसमें विषाद , दैन्य , स्मृति , जड़ता आदि संचारियों की व्यंजना है ।

इस प्रकार करुणा के सम्पूर्ण उपकरण और ‘ शोक ‘ नामक स्थायी भाव इस पद्य को करुण रस – दशा तक पहुँचा रहे हैं ।

( 3 ) हास्य रस 

( क ) अर्थ – वेशभूषा , वाणी , चेष्टा आदि की विकृति को देखकर हृदय में विनोद का जो भाव जाग्रत होता है, उसे ‘ हास ‘ कहा जाता है । यही ‘ हास ‘ विभाव , अनुभाव तथा संचारी भाव से पुष्ट होकर ‘ हास्य रस ‘ में परिणत हो जाता है ।

( ख ) उपकरण :

  1. स्थायी भाव – हास ।
  2. आलम्बन विभाव – विकृत वेशभूषा , आकार एवं चेष्टाएँ ।
  3. उद्दीपन विभाव – आलम्बन की अनोखी आकृति , बातचीत , चेष्टाएँ आदि ।
  4.  अनुभाव – आश्रय की मुस्कान , नेत्रों का मिचमिचाना एवं अट्टहास ।
  5.  संचारी भाव – हर्ष , आलस्य , निद्रा . चपलता , कम्पन , उत्सुकता आदि ।

उदाहरण-

बिन्ध्य के बासी उदासी तपो ब्रतधारि महा बिनु नारि दुखारे।

गौतम तीय तरी तुलसी सो कथा सुनि भे मुनिबृन्द सुखारे ॥

ढहैं सिला सब चन्द्रमुखी परसे पद मंजुल कंज तिहारे ।

कीन्हीं भली रघुनायक जू ! करुना करि कानन को पगु धारे ॥ – तुलसीदास

स्पष्टीकरण- इस छन्द में स्थायी भाव ‘ हास ‘ है । ‘ रामचन्द्रजी ‘ आलम्बन हैं , ‘ गौतम की स्त्री का उद्धार ‘ उद्दीपन है । ‘ मुनियों की कथा आदि सुनना ‘ अनुभाव हैं तथा ‘ हर्ष , उत्सुकता , चंचलता ‘ आदि संचारी भाव हैं । इसमें हास्य रस का आश्रय पाठक है तथा आलम्बन हैं — विन्ध्य के उदास वासी । .

( 4 ) रौद्र रस 

( क ) अर्थ – जहाँ विपक्ष द्वारा किए गए अपमान अथवा अपने गुरुजन आदि की निन्दा आदि से क्रोध उत्पन्न होता है , वहाँ ‘ रौद्र रस ‘ होता है ।

( ख ) उपकरण :

  1.  स्थायी भाव – क्रोध ।
  2. आलम्बन विभाव – विपक्षी , अनुचित बात कहनेवाला व्यक्ति ।
  3. उद्दीपन विभाव – विपक्षियों के कार्य तथा उक्तियाँ
  4. अनुभाव – मुख लाल होना , दाँत पीसना , आत्म – प्रशंसा , शस्त्र चलाना , भौंहें चढ़ना , कम्प , प्रस्वेद , गर्जन – आदि ।
  5. संचारी भाव – आवेग , अमर्ष , उग्रता , उद्वेग , स्मृति , असूया , मंद , मोह आदि ।

उदाहरण-

उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उनका लगा ।

मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा ॥

स्पष्टीकरण – यहाँ अभिमन्यु के वध का समाचार सुनकर अर्जुन के क्रोध का वर्णन किया गया है । इसमें स्थायी भाव ‘ क्रोध ‘ , आश्रय ‘ अर्जुन ‘ , विभाव ‘ अभिमन्यु का वध ‘ तथा अनुभाव ‘ हाथ मलना , मुख लाल होना एवं तन काँपना ‘ तथा संचारी भाव ‘ उग्रता ‘ आदि है।

( 5 ) वीर रस 

अर्थ – युद्ध अथवा किसी कठिन कार्य को करने के लिए हृदय में जो उत्साह जाग्रत होता है , उससे ‘ वीर रस ‘ की निष्पत्ति होती है ।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने उत्साह की व्याख्या करते हए लिखा है – “ जिन कर्मों में किसी प्रकार का कष्ट या हानि सहने का साहस अपेक्षित होता है , उन सबके प्रति उत्कण्ठापूर्ण आनन्द , उत्साह के अन्तर्गत लिया जाता है । यह उत्साह दान , धर्म , दया , युद्ध आदि किसी भी क्षेत्र में हो सकता है । “

इस आधार पर चार प्रकार के वीर होते हैं –

  1. युद्धवीर ,
  2. दानवीर ,
  3. धर्मवीर ,
  4. दयावीर ।

( ख ) उपकरण :

  1.  स्थायी भाव – उत्साह ।
  2. आलम्बन विभाव – अत्याचारी शत्रु ।
  3. उद्दीपन विभाव – शत्रु का पराक्रम , अहंकार , रणवाद्य , याचक का आर्तनाद , यश की इच्छा आदि ।
  4. अनुभाव – रोमांच , गर्वपूर्ण उक्ति , प्रहार करना , कम्प , धर्मानुकूल आचरण आदि ।
  5. संचारी भाव – उग्रता , आवेग , गर्व , चपलता , धृति , मति , स्मृति , हर्ष , उत्सुकता , असूया आदि ।

उदाहरण –

क्रुद्ध दशानन बीस भुजानि सो लै कपि रीछ अनी सर बट्टत ।

लच्छन तच्छन रक्त किए दृग लच्छ विपच्छन के सिर कट्टत ॥

मार पछारु पुकारे दुहूँ दल , रुण्ड झपट्टि दपट्टि लपट्टत ।

रुण्ड लरै भट मत्थनि लुट्टत जोगिनि खप्पर ठट्टनि ठट्टत ॥

स्पष्टीकरण – यहाँ पर लंका के युद्ध में रीछ – वानरों की सेना को देखकर रावण के युद्ध का वर्णन है । रावण के हृदय में उत्साह ‘ स्थायी भाव है । ‘ रीछ तथा वानर ‘ आलम्बन हैं । ‘ वानरों की विभिन्न लीलाएँ ‘ उद्दीपन हैं । ‘ नेत्रों का लाल होना , शत्रुओं के सिर को काटना आदि ‘ अनुभाव हैं । ‘ उग्रता , अमर्ष ‘ आदि संचारी भाव हैं ।

( 6 ) भयानक रस

( क ) अर्थ – किसी भयानक अथवा अनिष्टकारी वस्त या व्यक्ति को देखने , उससे सम्बन्धित वर्णन सुनने स्मरण करने आदि से चित्त में जो व्याकुलता उत्पन्न होती है, उसे ‘ भय ‘ कहते हैं । इस भय के जाग्रत और उद्दीप्त होने पर जिस रस की निष्पत्ति होती है . उसे ‘ भयानक रस ‘ कहते हैं ।

( ख ) उपकरण :

  1. स्थायी भाव – भय ।
  2. आलम्बन विभाव – बाघ , चोर , सर्प , शन्य स्थान , भयंकर वस्तु का दशन आदि ।
  3. उद्दीपन विभाव – भयानक वस्तु का स्वर , भयंकर स्वर आदि का डरावनापन एवं भयंकर चेष्टाएँ ।
  4. अनुभाव – कम्पन , पसीना छूटना , मुँह सूखना , चिन्ता होना , रोमांच , मूर्छा , पलायन , रुदन आदि ।
  5. संचारी भाव – दैन्य , सम्भ्रम , चिन्ता , सम्मोह , त्रास आदि ।

उदाहरण

एक ओर अजगरहिं लखि , एक ओर मृगराय ।

बिकल बटोही बीच ही , पर्यो मूर्छा खाय ॥

स्पष्टीकरण – यहाँ ‘ मार्ग में जानेवाले बटोही का भय ‘ स्थायी भाव है । ‘ अजगर एवं सिंह ‘ आलम्बन हैं । ‘ अजगर और सिंह का दोनों ओर से घेरना ‘ उद्दीपन है ।

पथिक का विकल या मूर्छित हो जाना ‘ अनुभाव है । ‘ त्रास , दैन्य , भय , अपस्मार ‘ आदि संचारी भाव हैं । इस प्रकार इस दोहे में भयानक रस की पूर्ण सामग्री विद्यमान है ।

( 7 ) बीभत्स रस 

( क ) अर्थ – घृणित वस्तुओं को देखकर अथवा उनके सम्बन्ध में सुनकर उत्पन्न होनेवाली घृणा या ग्लानि ‘ बीभत्स रस ‘ की पुष्टि करती है । तात्पर्य यह है कि बीभत्स रस के लिए घृणा और जुगुप्सा आवश्यक हैं ।

( ख ) उपकरण : 

  1. स्थायी भाव – जुगुप्सा ।
  2. आलम्बन विभाव – दुर्गन्धमय मांस , रक्त , अस्थि आदि ।
  3. उद्दीपन विभाव – रक्त , मांस का सड़ना , उसमें कीड़े पड़ना , दुर्गन्ध आना , पशुओं का इन्हें । नोचना – खसोटना आदि ।
  4. अनुभाव – नाक को टेढ़ा करना , मुँह बनाना , थूकना , आँखें मींचना , घृणा आदि ।
  5. संचारी भाव – ग्लानि , आवेग , शंका , मोह . व्याधि , चिन्ता , वैवर्ण्य , जड़ता आदि ।

उदाहरण –

सिर पर बैठो काग , आँखि दोउ खात निकारत ।

खींचत जीभहिं स्यार , अतिहि आनंद उर धारत । ।

गिद्ध जाँघ कह खोदि – खोदि के मांस उचारत ।

स्वान आँगुरिन काटि – काटि के खान बिचारत ॥

बहु चील्ह नोंचि ले जात तुच , मोद मढ्यो सबको हियो ।

जनु ब्रह्म – भोज जिजमान कोउ , आज भिखारिन कहुँ दियो ।

स्पष्टीकरण – यह श्मशान का दृश्य है । पशु – पक्षियों की क्रीड़ाओं को देखकर चाण्डाल – सेवारत राजा हरिश्चन्द्र के मन में जो ‘ घृणा ‘ पैदा हो रही है , वही स्थायी भाव है ।

‘ शवों की हड्डी , त्वचा आदि ‘ आलम्बन विभाव हैं । ‘ कौओं का आँख निकालना , सियार का जीभ को खींचना , गिद्ध का जाँघ खोद – खोदकर मांस नोचना तथा कुत्तों का उँगलियों को काटना ‘ उद्दीपन है ।

‘ राजा हरिश्चन्द्र द्वारा इनका वर्णन ‘ अनुभाव है । ‘ मोह , स्मृति आदि ‘ संचारी भाव हैं । इस प्रकार यहाँ बीभत्स रस की निष्पत्ति हुई है ।

( 8 ) अद्भुत रस 

( क ) अर्थ – विचित्र अथवा आश्चर्यजनक वस्तुओं को देखकर हृदय में विस्मय आदि के भाव उत्पन्न होते हैं । इन्हीं भावों के विकसित रूप को ‘ अद्भुत रस ‘ कहा जाता है ।

( ख ) उपकरण :

  1. स्थायी भाव – आश्चर्य ।
  2. आलम्बन विभाव – आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला पदार्थ या व्यक्ति ।
  3. उद्दीपन विभाव – अलौकिक वस्तुओं का दर्शन , श्रवण , कीर्तन आदि ।
  4. अनुभाव – दाँतों तले उँगली दबाना , आँखें फाड़कर देखना , रोमांच , आँसू आना , काँपना , गद्गद होना आदि ।
  5. संचारी भाव – उत्सुकता , आवेग , भ्रान्ति , धृति , हर्ष , मोह आदि ।

उदाहरण –

इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा । मति भ्रम मोरि कि आन बिसेंखा ॥

देखि राम जननी अकुलानी । प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी ॥

देखरावा . मातहि निज , अद्भुत रूप अखण्डा रोम – रोम प्रति लागे , कोटि – कोटि ब्रह्मण्ड ॥ – तुलसीदास

स्पष्टीकरण – बालक राम को एक साथ ही दो स्थानों पर देखकर ‘ माता कौशल्या के मन में उत्पन्न होनेवाला आश्चर्य ‘ स्थायी भाव है । यहाँ ‘ राम ‘ आलम्बन हैं । ‘ राम का एक साथ दो स्थानों पर दिखाई देना तथा उनका अखण्ड रूप ‘ उद्दीपन है ।

कौशल्या का पुलकित होना , वचन न निकलना तथा आँखें बन्द करके राम के चरणों में सिर झुकाना ‘ अनुभाव हैं । ‘ भ्रान्ति , त्रास , वितर्क आदि ‘ संचारी भाव हैं । इस प्रकार यहाँ अद्भुत रस की पूर्ण अभिव्यक्ति

( 9 ) शान्त रस 

(क) अर्थ – तत्व-ज्ञान की प्राप्ति अथवा संसार से वैराग्य होने पर शान्त रस की उत्पत्ति होती है । जहां न सुख , न द्वेष है, न राग और न कोई इच्छा है, ऐसी मनःस्थिति में उत्पन्न रस को मुनियों ने ‘शांत रस’ कहा है ।

( ख ) उपकरण :

  1. स्थायी भाव – निवेद ।
  2. आलम्बन विभाव – परमात्मा का चिन्तन एवं संसार की क्षणभंगुरता ।
  3. उद्दीपन विभाव – सत्संग , तीर्थस्थलों की यात्रा , शास्त्रों का अनुशीलन आदि ।
  4. अनुभाव – पूरे शरीर में रोमांच , पुलक , अश्रु आदि ।
  5. संचारी भाव – धृति , हर्ष , स्मृति , मति , विबोध , निवेद आदि ।

उदाहरण –

कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो । ।

श्री रघुनाथ – कृपालु – कृपा तें सन्त सुभाव गहाँगो । ।

जथालाभ सन्तोष सदा काहू सों कछु न चहौंगो ।

परहित – निरत – निरंतर मन क्रम बचन नेम निबहाँगो ॥ – तुलसीदास

स्पष्टीकरण – इस पद में तुलसीदास ने श्री रघुनाथ की कृपा से सन्त – स्वभाव ग्रहण करने की कामना की है । ‘ संसार से पूर्ण विरक्ति और निर्वेद ‘ स्थायी भाव है । ‘ राम की भक्ति ‘ आलम्बन है ।

साधु – सम्पर्क एवं श्री रघुनाथ की कृपा उद्दीपन है । ‘ धैर्य , सन्तोष तथा अचिन्ता ‘ अनुभाव ‘ है । ‘ निर्वेद , हर्ष , स्मृति ‘ आदि ‘ संचारी भाव हैं । इस प्रकार यहाँ शान्त रस का पूर्ण परिपाक हुआ है ।

( 10 ) भक्ति रस

( क ) अर्थ – भक्ति रस के विषय में आचार्यों में बड़ा मतभेद है । प्राचीन आचार्य इसे देव – विषयक रति मानकर श्रृंगार रस का ही एक भेद मानते रहे हैं । जहाँ पर परमात्मा – विषयक प्रेम विभाव आदि से परिपष्ट हो जाता है , वहाँ पर ‘ भक्ति रस ‘ की उत्पत्ति होती है ।

( ख ) उपकरण :

  1. स्थायी भाव – भगवान् – विषयक रति ।
  2. आलम्बन विभाव – परमेश्वर , राम , श्रीकृष्ण आदि ।
  3. उद्दीपन विभाव – परमात्मा के अद्भुत कार्य – कलाप , सत्संग , भक्तों का समागम आदि ।
  4. अनभाव – भगवान् के नाम तथा लीला का कीर्तन , आंखों से आंसुओं का गिरना . गदगद हो जाना कभी रोना , कभी नाचना आदि ।
  5. संचारी भाव – निर्वेद , मति , हर्ष , वितर्क आदि ।

उदाहरण –

अँसुवन जल सींचि – सींचि , प्रेम – बेलि बोर्ड ।

‘ मीरा ‘ की लगन लागी , होनी हो सो होई ॥ – मीरा

स्पष्टीकरण- इन पंक्तियों में ‘ श्रीकृष्ण के प्रति मीरा का अनुराग ‘ स्थायी भाव है । ‘ श्रीकृष्ण ‘ आलम्बन हैं । ‘ सत्संग ‘ उहीपन है । ‘ आँसू प्रेम – बेलि का बोना और आँसुओं से सींचना’ अनुभाव है । ‘ शंका , हर्ष आदि ‘ संचारी भाव है । इस प्रकार यहाँ भक्ति रस का सुन्दर परिपाक हुआ है ।

( 11 ) वात्सल्य रस 

अर्थ – पुत्र , बालक , शिष्य , अनुज आदि के प्रति रति का भाव स्नेह कहलाता है । यही भाव परिपुष्ट होकर ‘ वात्सल्य रस ‘ की व्यंजना करता है ।

स्थायी भाव – स्नेह ( वत्सलता ) ।

आलम्बन विभाव – पुत्र , शिशु एवं शिष्य ।

उद्दीपन विभाव – बालक की चेष्टाएँ , तुतलाना , हठ करना आदि तथा उसका रूप एवं उसकी वस्तुएँ ।

अनुभाव – स्नेह से बालक को गोद में लेना , आलिंगन करना , सिर पर हाथ फेरना , थपथपाना आदि ।

संचारी भाव – हर्ष , गर्व , मोह , चिन्ता , आवेग , शंका आदि ।

उदाहरण –

तन की दुति श्याम सरोरुह लोचन कंज की मंजुलताई हरें |

अति सुन्दर सोहत धूरि भरे छवि भूरि अनंग की धूरि धरै । ।

दमकैं दतियाँ दति दामिनि ज्यौं किलकें कल बाल – बिनोद करें ।

अवधेस के बालक चारि सदा तुलसी मन – मन्दिर में बिहरेण ॥ – तुलसीदास

स्पष्टीकरण – यहाँ ‘ स्नेह ‘ ( वत्सलता ) स्थायी भाव है । ‘ राम और उनके भाई ‘ आलम्बन हैं । ‘उनके धूल धूसरित शरीर , बाल – क्रीड़ाएँ , छोटे – छोटे दाँतों का चमकना ‘ आदि उद्दीपन हैं ।

‘ उनके ‘ बाल – विनोद से माता – पिता का आनन्दित होना ‘ अनुभाव है । ‘ हर्ष और गर्व ‘ संचारी – भाव हैं । इस प्रकार यहाँ वात्सल्य रस की पूर्ण निष्पत्ति हुई है |

निम्नलिखित पद्यांश में कौन – सा रस है ? उसका स्थायी भाव बताइए

कहत , नटत , रीझत , खिझत , मिलत , खिलत लजियात ।

भरे भौन मैं करत हैं नैननु ही सौं बात ॥

उत्तर – इस पद्यांश में संयोग शृंगार है । इसका स्थायी भाव रति है ।

रस सम्बन्धी बहुविकल्पीय प्रश्न एवं उनके उत्तर उपयुक्त विकल्प द्वारा निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

निष्कर्ष :

आपने जाना की रस क्या होता है, उसके What is Ras in Hindi Grammar