Goswami Tulsidas Par Nibandh

गोस्वामी तुलसी दास पर हिंदी में निबंध 

ये Goswami Tulsidas Par Nibandh विभिन्न बोर्ड जैसे UPBoard, Bihar Board और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को दृश्टिगत रखते हुए लिखा गया है, अगर आपके मन  सवाल हो तो comment लिख कर पूछ सकते हैं |

अन्य सम्बंधित शीर्षक –

  • लोकनायक तुलसीदास
  • समन्वय के प्रतीक : तुलसीदास
  • अमर कवि तुलसीदास
  • पना ( मेरा ) प्रिय कवि ( UP Board 2000 , 02 , 05 , 06 , 07 , 08 , 09 , 10 )
  • राम काव्यधारा के प्रमुख कवि

“ प्रभु का निर्भय सेवक था , स्वामी था अपना जाग चुका था , जग था जिसके आगे सपना । प्रबल प्रचारक था जो उस प्रभु की प्रभुता का , अनुभव था सम्पूर्ण जिसे उसकी विभुता का । । राम छोड़कर और की , जिसने कभी न आस । रामचरितमानस – कमल , जय हो तुलसीदास । । ”  – जयशंकरप्रसाद

Goswami Tulsidas Par Nibandh की  रूपरेखा 

  1. प्रस्तावना
  2. जन्म की परिस्थितियाँ
  3. तुलसीदास : एक लोकनायक के रूप में
  4. तुलसी के राम
  5. तुलसी की निष्काम भक्ति – भावना
  6. तुलसी की समन्वय – साधना
  7. तुलसी के दार्शनिक विचार
  8.  तुलसीकृत रचनाएँ
  9. उपसंहार

1- प्रस्तावना 

मैं यह तो नहीं कहता कि मैंने बहुत अधिक अध्ययन किया है ; तथापि भक्तिकालीन कवियों में कबीर , सूर और तुलसी तथा आधुनिक कवियों में प्रसाद , पन्त और महादेवी के काव्य का आस्वादन अवश्य किया है ।

इन सभी कवियों के काव्य का अध्ययन करते समय तुलसी के काव्य की अलौकिकता के समक्ष मैं सदैव नत – मस्तक होता रहा हूँ। उनकी भक्ति – भावना , समन्वयात्मक दृष्टिकोण तथा काव्य – सौष्ठव ने मुझे स्वाभाविक रूप से आकृष्ट करती करती है।

2- जन्म की परिस्थितियाँ

तुलसीदास का जन्म ऐसी विषम परिस्थितियों में हुआ , जब हिन्दू समाज अशक्त होकर विदेशी चंगुल में फँस चुका था । हिन्दू समाज की संस्कृति और सभ्यता प्राय : विनष्ट हो चुकी थी और कहीं कोई उचित आदर्श नहीं था ।

इस युग में जहाँ एक ओर मन्दिरों का विध्वंस किया गया , ग्रामों व नगरों का विनाश हुआ . वहीं संस्कारों की भ्रष्टता भी चरम सीमा पर पहुंची । इसके अतिरिक्त तलवार के बल पर हिन्दुओं को मुसलमान बनाया जा रहा था ।

सर्वत्र धार्मिक विषमताओं का ताण्डव नृत्य हो रहा था और विभिन्न सम्प्रदायों ने अपनी – अपनी डफली अपना – अपना राग अलापना आरम्भ कर दिया था । ऐसी परिस्थिति में भोली – भाली जनता यह समझने में असमर्थ थी कि वह किस सम्प्रदाय का आश्रय ले ।

उस समय की दिग्भ्रमित जनता को ऐसे नाविक की आवश्यकता थी , जो उसकी जीवन – नौका की पतवार को सँभाल ले । गोस्वामी तुलसीदास ने अन्धकार के गर्त में डूबी हुई जनता के समक्ष भगवान राम का लोकमंगलकारी रूप प्रस्तुत किया किया और उसमें अपूर्व आशा एवं शक्ति का संचार किया ।

युगद्रष्टा तुलसी ने अपने ‘ श्रीरामचरितमानस ‘ द्वारा भारतीय समाज में व्याप्त विभिन्न मतों , सम्प्रदायों एवं धाराओं का समन्वय किया । उन्होंने अपने यंग को नवीन दिशा , गति और प्रेरणा दी । उन्होंने सच्चे लोकनायक के समान वैमनस्य की चौड़ी खाई को पाटने का सफल प्रयत्न किया ।

3- तुलसी : एक लोकनायक के रूप में 

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन है कि

” लोकनायक रोकता है जो समन्वय कर सके, क्योकि भारतीय समाज में नाना प्रकार की परस्पर विरोधिनी संस्कृतियाँ , जानियाँ आचार – निष्ठा और विचार – पद्धतियाँ प्रचलित हैं । भगवान् बुद्ध समन्वयकारी थे ‘ गीता ‘ ने समन्वय की चेष्टा की और तुलसीदास भी समन्वयकारी थे । “

4-  तुलसी के राम

तुलसी उन राम के उपासक थे , जो सच्चिदानन्द परमब्रह्म है ; जिन्होने भूमि का भार हरण करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया था

जब – जब होई घरम कै हानी । बाढहिं असुर अघम अभिमानी । । तव – तब प्रभु घरि बिबिध सरीरा । हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा । ।

तुलसी ने अपने काव्य में सभी देवी – देवताओं को स्तुति की है , लेकिन अन्त में वे यही कहते हैं

माँगत तुलसीदास कर जोरे । बसहिं रामसिय मानस मोरे । ।

निम्नलिखित पंक्तियों में उनकी अनन्यता और भी अधिक पुष्ट हुई है

एक भरोसो एक बल , एक आस बिस्वास । एक राम घनस्याम हित , चातक तुलसीदास । ।

तुलसी के समक्ष ऐसे राम का जीवन था , जो मर्यादाशील थे और शक्ति एवं सौन्दर्य के अवतार थे ।

5- तुलसीदास की निष्काम भक्ति – भावना 

सच्ची भक्ति वही है , जिसमें आदान – प्रदान का भाव नहीं होता है । भक्त के लिए भक्ति का आनन्द ही उसका फल है ।

तुलसी के अनुसार

मो सम दीन न दीन हित , तुम समान रघुबीर । अस बिचारि रघुबंसमनि , हरहु बिषम भव भीर । ।

6- तुलसी की समन्वय – साधना

तुलसी के काव्य की विशेषता उसमें निहित समन्वय की प्रवृत्ति है । इस प्रवृत्ति के कारण वे वास्तविक अर्थों में लोकनायक कहलाए । उनके काव्य में समन्वय के निम्नलिखित रूप दृष्टिगत होते हैं 

( क ) सगुण – निर्गुण का समन्वय – ईश्वर के सगुण एवं निर्गुण दोनों रूपों से सम्बन्धित विवाद दर्शन एवं भक्ति दोनों ही क्षेत्रों में प्रचलित रहे हैं , इस पर तुलसीदास ने कहा –

सगुनहिं अगुनहिं नहिं कछु भेदा । गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा ॥

 ( ख ) कर्म , ज्ञान एवं भक्ति का समन्वय – तुलमी को भक्ति मनुष्य को संसार से विमुख करके अकर्मण्य बनाने वाली नहीं है , उनकी भक्ति तो सत्कर्म की प्रबल प्रेरणा देनेवाली है । उनका सिद्धान्त है कि राम के समान आचरण करो , रावण के सदृश दुष्कर्म नहीं । जो जैसा करता है , वैसा ही फल भोगता है , इस सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए उन्होंने सद्कर्म करने पर बल दिया है-

कर्म प्रधान विश्व करि राखा ।

जो जस करई सो तस फल चाखा ।

तुलसी ने ज्ञान और भक्ति के धागे में राम – नाम का मोती पिरो दिया है

हिय निर्गुन नयनन्हि सगुन , रसना राम सुनाम ।

मनहुँ पुरट सम्पुट लसत , तुलसी ललित ललाम । । 

( ग ) युगधर्म – समन्वय – भक्ति की प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार के बाह्य तथा आन्तरिक साधनों की आवश्यकता होती है । ये साधन प्रत्येक युग के अनुसार बदलते रहते हैं और इन्हीं को युगधर्म की संज्ञा दी जाती है ।

तुलसी ने इनका भी विलक्षण समन्वय प्रस्तुत किया है

कृतजुग त्रेता द्वापर , पूजा मख अरु जोग ।

जो गति होइ सो कलि हरि , नाम ते पावहिं लोग । । 

( घ ) साहित्यिक समन्वय – साहित्यिक क्षेत्र में भाषा , छन्द , रस एवं अलंकार आदि की दृष्टि से भी तुलसी ने अनुपम  समन्वय स्थापित किया । उस समय साहित्यिक क्षेत्र में विभिन्न भाषाएं विद्यमान थीं । तुलसी ने अपने काव्य में संस्कृत , अवधा तथा ब्रजभाषा का अद्भुत समन्वय किया । 

7- तुलसी के दार्शनिक विचार

तुलसीदास ने किसी विशेष वाद को स्वीकार नहीं किया । उन्होंने वैष्णव धर्म को इतना व्यापक रूप प्रदान किया कि उसके अन्तर्गत शैव , शाक्त और पुष्टिमार्गी भी सरलता से समाविष्ट हो गए ।

वस्तुतः तुलसी भक्त हैं और इसी आधार पर वह अपना व्यवहार निश्चित करते हैं । उनकी भक्ति सेवक – सेव्य को है । वे स्वयं को राम का सेवक और राम को अपना स्वामी मानते है ।

8-  तुलसीकृत रचनाएँ

तुलसी के 12 ग्रन्थ प्रामाणिक माने जाते हैं ।

तुलसी दास पर निबंध

ये ग्रन्थ हैं —

  • ‘ श्रीरामचरितमानस Tulsidas Ramayan ‘
  • ‘ विनयपत्रिका ‘
  • ‘ गीतावली ‘
  • ‘ कवितावली ‘
  • ‘ दोहावली (Tulsi Dohawali) ‘
  • ‘ रामललानहछू ‘
  • ‘ पार्वतीमंगल ‘
  • ‘ जानकीमंगल ‘
  • ‘ बरवै रामायण ‘
  • ‘ वैराग्य संदीपनी ‘
  • ‘ श्रीकृष्णगीतावली ‘
  • ‘ रामाज्ञाप्रश्नावली ‘ ।

तुलसी की ये रचनाएँ विश्व – साहित्य की अनुपम निधि हैं ।

उपसंहार :

तुलसी ने अपने युग और भविष्य , स्वदेश और विश्व तथा व्यक्ति और समाज आदि सभी के लिए महत्त्वपूर्ण सामग्री दी है । तुलसी को आधुनिक दृष्टि ही नहीं , प्रत्येक युग की दृष्टि मूल्यवान् मानेगी ; क्योंकि मणि की चमक अन्दर से आती है , बाहर से नहीं ।

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