Ganga Nadi Par Nibandh

गंगा नदी पर निबंध – गंगा की आत्मकथा

ये गंगा नदी पर निबंध विभिन्न बोर्ड जैसे UP Board, Bihar Board और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को दृश्टिगत रखते हुए लिखा गया है, अगर आपके मन  सवाल हो तो comment लिख कर पूछ सकते हैं |

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  • गंगा तेरा पानी अमृत
  • मुक्तिदायिनी गंगा ।

गंगा नदी पर निबंध की  रूपरेखा 

  1. प्रस्तावना
  2. धरती पर अवतरित होने की महान् कथा
  3. मेरा उद्गम स्थल
  4. मेरी यात्रा – पथ
  5. उपसंहार

1- प्रस्तावना 

मुक्तिदा मानी गई है, स्वर्गदा गंगा नदी ।

जल नहीं , जल है सुधासम , सर्वथा सर्वत्र ही ॥

मेरा नाम गंगा है – पतितपावनी गंगा। मेरे किनारों पर बसे हए अनेक तीर्थ – स्थान एक ओर मेरी महिमा क गीत गात है तो दूसरा और अपनी पवित्रता के कारण जन – जन के मन को पावन कर देते हैं|

महाकवि कालिदास ने अपने ‘ गंगाष्टक ‘ में मेरी प्रशंसा करते हुए

नमस्तेऽस्तु गङ्गे त्वदङ्गप्रसङ्गाभुजङ्गास्तुरङ्गा कुरङ्गा प्लवङ्गा ।

अनङ्गारिरङ्गा ससङ्गा शिवाजा भुजङ्गाधिपाडा कृताङ्गा भवन्ति । ।

अर्थात हे गंगे ! तुम्हारे शरीर के संसर्ग से साँप, घोडे हिरण और बन्दर आदि भी कामारि शिव के समान वर्णवाल शिव के संगी और कल्याणमय शरीरवाले होकर, अंग में भजंगराजों को लपेटे हए सानन्द विचरते हैं ; अतः तुमको नमस्कार है।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने मेरी उज्ज्वल जलधारा का मनोहारी चित्रण करते हुए लिखा है,

नव उज्ज्वल जलधार हार हीरक – सी सोहति।

बिच – बिच छहरति बूंद मध्य मुक्ता मनि पोहति ॥

लोल लहर लहि पवन एक पै इक इमि आवत ।

जिमि नर – गन मन विविध मनोरथ करत मिटावत ॥

सुभग स्वर्ग सोपान सरिस सबके मन भावत ।

‘ दरसन मज्जन पान त्रिविध भय दर मिटावत । ।

वेदों के अनुसार मैं देवताओं की नदी हूँ । मैं पहले स्वर्ग में बहती थी । देवगण मेरे जल को अमृत कहते थे । एक दिन देवलोक से उतरकर मुझे पृथ्वी पर आना पड़ा । राजा सगर , के वंशजों की तप – परम्परा ने मुझे पृथ्वी पर आने के लिए विवश कर दिया ।

2- धरती पर अवतरित होने की महान् कथा

मेरे धरती पर आने की कहानी कम रोचक और रोमांचक नहीं है । बात बहुत पुरानी है ।

सगर नाम के एक प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा थे । उन्होंने सौ अश्वमेध यज्ञ पूरे कर लिए थे । अन्तिम यज्ञ के लिए जब उन्होंने श्यामवर्ण का अश्व ( घोड़ा ) छोड़ा तो इन्द्र का सिंहासन हिलने लगा । सिंहासन छिन जाने के भय से इन्द्र ने उस अश्व को चुरा लिया और कपिल मुनि के आश्रम में जाकर बाँध दिया ।

राजा सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को अश्व की खोज के लिए भेजा । पर्याप्त खोज के बाद वे कपिल मुनि के आश्रम पहुँचे । वहाँ पर अश्व को बंधा हुआ देखकर राजकुमारा ने महर्षि कपिल को अश्व चुरानेवाला समझकर उनका अपमान किया ।

क्रोधित कपिल मुनि ने सभी राजकुमारों को अपने शाप के प्रभाव से भस्म कर दिया । राजा सगर के पौत्र अंशुमान ने कपिल मुनि को प्रसन्न किया और उनसे अपने चाचाओं की मुक्ति का उपाय पूछा ।

मुनि ने बताया कि जब स्वर्ग से गंगा भूलोक पर उतरेगी और राजकुमारों की भस्म का स्पर्श करेगी तभी उनकी मुक्ति होगी । इसके बाद अंशुमान ने घोर तप किया, किन्तु वे सफल न हुए ।

राजा अंशुमान के पश्चात् उनके पुत्र दिलीप का अथक श्रम भी व्यर्थ गया । तदनन्तर दिलीप के पुत्र भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर मैंने पृथ्वी पर आना स्वीकार किया । इस प्रकार राजा सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार करने के लिए मुझे पृथ्वी पर आना पड़ा ; क्योंकि भगीरथ मुझे पृथ्वी पर लाए थे , इसलिए मेरा नाम भागीरथी भी पड़ गया ।

3- मेरा उद्गम स्थल

हिमालय की गोद में एक एकान्त स्थान पर एक छोटी – सी घाटी बन गई है , जो लगभग डेढ़ किलोमीटर चौड़ी है । इस घाटी के चारों ओर बर्फ से ढके हुए ऊँचे – ऊँचे पर्वत – शिखर हैं । यहाँ बहुत अधिक ठण्ड पड़ती है ।

यहीं पर एक गुफा है ; जिसे गोमुख कहते हैं । यहीं से मेरा उद्गम होता है । गोमुख का अर्थ है – गाय  अथवा पृथ्वी का मुख । इस अँधेरी गुफा का आकार वास्तव में गाय के मुख के समान है । यह गुफा पर्याप्त ऊँची और चौड़ी है ।

कभी – कभी इसके किनारों से बर्फ के बड़े – बड़े टुकड़े टूटकर गिरते हैं और मैं अपने तेज बहाव में उन्हें बालू – मिश्रित घाटी की ओर ले जाती हूँ । जैसे – जैसे दोनों ओर की ढलानों पर बर्फ पिघलती है , छोटी – छोटी नदियाँ बनती जाती हैं और नीचे जाकर मुझमें मिल जाती हैं ।

4.  मेरी यात्रा – पथ 

गाती , नाचती , कूदती हुई मेरी धारा अब गंगोत्री के पास से गुजरती है । यह एक छोटा – सा तीर्थ – स्थान है । गंगोत्री के किनारों पर चट्टानें और पत्थर बिछे हैं । जिन पर से होकर बर्फ – सा ठण्डा मेरा जल किलोल करता हुआ बहता है ।

यह स्थान समुद्र की सतह से 6 , 000 मीटर ऊँचा है । धीरे – धीरे मैं बड़े पहाड़ों , ऊँचे – ऊँचे वृक्षों और सँकरे रास्तों से होकर छोटे – छोटे जल – स्रोतों का पानी एकत्र करती हुई आगे बढ़ती जाती हूँ ।

देवप्रयाग में मुझसे अलकनन्दा का मिलन होता है । यहाँ से मेरी गति और अधिक बढ़ गई है । । जहाँ मैं अपने पिता हिमराज की गोद से मैदान में उतरती हूँ वहाँ हरिद्वार का पुण्य तीर्थ बन गया है ।

हरिद्वार से कुछ ऊपर ऋषिकेश में एक बहुत सुन्दर स्थान है ; जिसे लक्ष्मण – झूला कहते हैं । यहाँ कुछ अत्यन्त प्राचीन और सुन्दर मन्दिर हैं और मेरे ऊपर झूलता हुआ एक विशाल पुल भी है ।

हरिद्वार से हजारों किलोमीटर की यात्रा करती हुई तथा प्रयाग और काशी के तटों को पवित्र – पावन बनाती हुई मेरी धारा बंगाल तक पहुँचती है । यहाँ श्रीचैतन्य महाप्रभु का जन्मस्थान और वैष्णवों का प्रसिद्ध तीर्थ ‘ नदिया ‘ है ।

इसी नगर के पास मेरा नया नामकरण हुआ है — हुगली । यहाँ मेरे दोनों किनारों पर नगर बसे हैं । एक ओर कोलकाता बसा है तो दूसरे किनारे पर हावड़ा । हुगली नदी के मुहाने के पास दक्षिण से आकर दामोदर नदी मुझमें मिल जाती है । यह मिलन – स्थल बड़ा मनोरम है । यहाँ का प्राकृतिक दृश्य देखते ही बनता है ।

13- उपसंहार :

मेरी कहानी बहुत लम्बी है । मन्दाकिनी , सुरसरि , विष्णुपदी , देवापगा , हरिनदी एवं भागीरथी आदि मेरे अनेक नाम हैं । मेरी स्तुति लिखकर कालिदास , भवभूति , भारवि , वाल्मीकि , तुलसी , पद्माकर आदि अनेक कवियों की लेखनी ने अपने – आपको धन्य समझा है ।

गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में “दरस परस अरु मज्जन पाना । कटहिं पाप कहँ बेद – पुराना ॥”

इस प्रकार प्रकृति के महान् प्रतीक हिमालय के विस्तृत हिमशिखरों से उदित होकर भारतवर्ष के विशाल वक्ष पर मुक्तामाला के समान लहराती हुई मैं भागीरथी गंगा भारत की प्रवाहमयी संस्कृति की पवित्र प्रतीक हूँ । .

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