Essay on Premchand in Hindi

मेरे प्रिय लेखक : प्रेमचंद पर निबंध

ये Essay on Premchand in Hindi विभिन्न बोर्ड जैसे UPBoard, Bihar Board और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को दृश्टिगत रखते हुए लिखा गया है, अगर आपके मन  सवाल हो तो comment लिख कर पूछ सकते हैं |

इस शीर्षक से मिलते-जुलते अन्य सम्बंधित शीर्षक –

  • कथा – साहित्य और प्रेमचन्द
  • साहित्य के गौरव : प्रेमचन्द
  • कलम का सिपाही : प्रेमचन्द
  • आपका प्रिय लेखक ( 2000 )
  • मेरा प्रिय लेखक ( 2004 , 05 )
  • मेरा प्रिय उपन्यासकार ( 2010 )

” प्रेमचन्द शताब्दियों से पददलित और अपमानित कृषकों की आवाज थे । परदे में केंद , पद – पद पर लांछित और अपमानित असहाय नारी – जाति की महिमा के जबरदस्त वकील थे । ” – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी 

Essay on Premchand in Hindi की  रूपरेखा 

  1. प्रस्तावना
  2. संक्षिप्त परिचय
  3. बाह्य रूप और परिधान
  4. कथा – साहित्य में प्रेमचन्द का आगमन : एक नए युग का सूत्रपात
  5. प्रेमचन्द के कथा – साहित्य में विषय की विविधता
  6. आदर्शोन्मुख यथार्थवाद
  7. शाश्वत जीवन – मूल्य
  8. भारतीयता पर आधारित दृष्टिकोण
  9. क्रान्तिद्रष्टा साहित्यकार
  10. राष्ट्रवादी दृष्टिकोण
  11. प्रेम चंद की रचनाएँ 
  12. उपसंहार

1- प्रस्तावना 

प्रेमचन्द हिन्दी – साहित्य के एक ऐसे कथाकार थे, जिससे सामान्य से सामान्य साक्षर व्यक्ति भी परिचित है । इनके साहित्य  दायरा झोपडी से लेकर राजा के राजमहल तक है । झोपड़ी से लेकर राजमहल तक जो कुछ भी प्रेमचन्द के दृष्टिपथ में आया , उनके साहित्य का विषय बन गया।

कैसा होगा वह साहित्यकार , जो अपने जीवन – पथ में सब – कुछ स्वीकारता तथा अपनाता चला गया । किसी को भी उससे उपेक्षा नहीं मिली , चाहे वह राह का पत्थर था या मन्दिर का देवता । प्रेमचन्द की दृष्टि में सब समान थे ।

वे दीन – दुःखियों के पक्षधर , कृषकों के मित्र , अन्याय के विरोधी शोषण के शत्रु और साहित्य के पुजारी थे । भारत की सामाजिक , आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था ! तू धन्य है कि तेरी छत्रच्छाया में इस जैसे महान् साहित्यकार का जन्म हुआ ।

2- संक्षिप्त परिचय

मुंसी प्रेमचन्द का जन्म उत्तर प्रदेश वाराणसी के निकट लमही गाँव में 31 जुलाई,1880 ई० को हुआ था । निरन्तर हिंदी साहित्य की सेवा करते हुए और भारत की मुक्ति (अंग्रेजों से) के लिए प्रयत्नशील रहते हुए उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द भारत के स्वाधीन होने से दस – ग्यारह वर्ष पहले 8 अक्टूबर, 1936 ई० को हमसे सदा के लिए विदा हो गए ।

3- बाह्य रूप और परिधान

प्रेमचन्द के पुत्र श्री अमृतराय के शब्दों में –

” क्या तो उनका हुलिया था । घुटनों से जरा ही नीचे तक पहुँचनेवाली मिल की धोती , उसके ऊपर गाढ़े का कुर्ता और पैर में बन्ददार जता, यानि कुल मिलाकर आप उसे देहकान ही कहते , गँवइया भुच्च, जो अभी गाँव से चला आ रहा है, जिसे कपड़ा पहनने की भी तमीज़ नहीं । यह भी नहीं मालूम की धोती – कुर्ते पर चप्पल पहनी जाती है या पम्प। आप शायद उन्हें प्रेमचन्द कहकर ‘ पहचानने से ही इनकार कर देते…….. और अब भी मुझे उनके दोनों पैरों की कानी उँगली की अच्छी तरह याद है , जो जूते को चीरकर बाहर निकली रहती थी। सादगी इससे आगे नहीं जा सकती । “

4- कथा – साहित्य में प्रेमचन्द का आगमन : एक नए युग का सूत्रपात

हिन्दी कथा साहित्य में प्रेमचन्द के आगमन से एक नए युग का आगमन था। उन्होंने हिन्दी कथा साहित्य को नया आयाम दिया और उसे अनन्त विस्तारमय क्षितिजों का संस्पर्श कराया ।

5- प्रेमचन्द के कथा – साहित्य में विषय की विविधता

प्रेमचन्द के कथा साहित्य में विषय की विविधता है । वे कहानी को मानव – जीवन का चित्रण मानते हैं । मानव – जीवन विविधतापूर्ण है, अत : उनकी कहानियों और उपन्यासों में जीवन के विविध मार्मिक पक्षों का उद्घाटन हुआ है । उनमें कहीं पर जीवन का सामाजिक पक्ष उभरा है , कहीं आर्थिक , कहीं नैतिक तो कहीं मनोवैज्ञानिक ।

6- आदर्शोन्मख यथार्थवाद

प्रेमचन्द शिव ( कल्याण ) के उपासक थे । उनकी रचनाओं में यथार्थ जीवन का चित्रण हुआ है ; किन्तु जीवन के आदर्श रूप की ओर मुड़ती हुई ये रचनाएँ हमारे मन पर मंगलमय प्रभाव छोड़ती हैं । मार्थिक , कहीं नैतिक तो कहीं प्रकार उनकी रचनाएँ यथार्थ की पृष्ठभूमि पर प्रतिष्ठित होते हुए भी आदर्श की ओर उन्मुख हैं । यह आदर्शोन्मुख यथार्थवाद उनकी रचनाओं की अपनी विशेषता है ।

7- शाश्वत जीवन – मूल्य

प्रेमचन्द शाश्वत जीवन – मूल्यों के लेखक थे । उनकी धारदार दृष्टि ने जीवन का वास्तविकता को देखा और परखा था । उन्होंने पराधीनता की कठोरताओं को देखा और भोगा था ।

उनका साहित्य इन परिस्थितियों और अनुभवों का सच्चा दस्तावेज है । जिन जीवन – मल्यों को प्रेमचन्द ने अपने साहित्य में उद्घाटित किया है , वे आज भी हमारे समाज के लिए पूर्ण रूप से मूल्यवान् हैं ।

8- भारतीयता पर आधारित दृष्टिकोण 

प्रेमचन्द की सम्पर्ण रचनाएँ भारतीयता से ओत – प्रोत हैं । उनके साहित्य में स्वतन्त्रतापूर्व भारतीय परिवेश की जीती – जागती झाँकी प्रस्तुत हुई है । उसमें सामाजिक जीवन के विविध रूप व व्यापक दृश्य आज भी ज्यों – के – त्यों बोलते – से दिखाई देते हैं ।

9- क्रान्तिद्रष्टा साहित्यकार

गांधीजी ने देश की स्वाधीनता के लिए जिस विचार – क्रान्ति की वकालत की थी , उसे प्रेमचन्द ने अपने साहित्य द्वारा विकसित किया । इस दष्टि से प्रेमचन्द क्रान्तिद्रष्टा साहित्यकार कहे जा सकते हैं ।

उनके साहित्य में समाज – सुधार की भावना व्यक्त हई है । अपने समाज का सम्पूर्ण प्रतिबिम्ब उनके समूचे साहित्य की मर्यादा है । सामाजिक शोषण , अन्याय और धनी – निर्धन के अन्तर को उद्घाटित करने के लिए प्रेमचन्द ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया ।

डॉ० , मोहनलाल रत्नाकर के अनुसार

” प्रेमचन्द ने अपने साहित्य के द्वारा समाज और देश में व्याप्त समस्याओं को न केवल उद्घाटित ही किया है । अपितु उनके समाधान की दृष्टि का भी निर्माण किया है ।…… प्रेमचन्द के उपन्यासों में एक ओर भारतीय जीवन और उसके दलित समाज का यथातथ्य चित्रण हुआ है और दूसरी और . समाज एवं देश की विभिन्न समस्याओं के समाधान भी प्रस्तुत किए गए हैं , जिससे भारतीय जनता सुख की सांस ले सके और उत्थान के पथ पर अग्रसर हो सके । “

10- राष्ट्रवादी दृष्टिकोण

प्रेमचन्द राष्ट्रवादी लेखक थे । उनकी पहली कहानी से लेकर अन्तिम कहानी ‘ कफन ‘ तक के सम्पूर्ण कथा – साहित्य में उनके अन्दर एक राष्ट्रभक्त का मन प्रतिबिम्बित होता है । देश की निर्धनता और शोषित वर्ग की उन्नति के लिए वे निरन्तर संघर्षरत रहे । अपनी ‘ गोदान ‘ जैसी महान् औपन्यासिक कृति में वे देश की जन – संस्कृति से जुड़कर चले हैं । इस प्रकार उनके साहित्य में उनका राष्ट्रवादी रूप ही मुखरित हुआ है ।

11- प्रेम चंद की रचनाएँ 

प्रेमचंद द्वारा लिखे गए प्रमुख रचनऐं निम्न प्रकार हैं –

  • सेवासदन
  • प्रेमाश्रम
  • रंगभूमि
  • निर्मला
  • कायाकल्प
  • गबन
  • कर्मभूमि
  • गोदान

12- उपसंहार :

प्रेमचन्द एक ऐसा हीरा है , जिसमें अनेक कटाव हैं और प्रत्येक कटाव में साहित्य के बहुविध रूप अनायास ही प्रतिबिम्बित हुए हैं । वस्तुतः प्रेमचन्द हमारे युग के साहित्य – सुधाकर थे । उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व का लेखा – जोखा हम यथातथ्य तो प्रस्तुत नहीं कर पाएँगे ; क्योकि इनकी प्रतिभा का पूर्ण आकलन कर पाना लगभग असम्भव है ।

उनकी महानता ऐसी है कि वे समय के प्रवाह के साथ उत्तरोत्तर अग्रसर होने पर और अधिक जगमगाएँगे । उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने में एक अनिर्वचनीय सुख की अनुभूति होती है ।

उनके द्वारा रचित कृतियाँ मात्र हिन्दी – साहित्य अथवा भारत की ही नहीं , वरन् सम्पूर्ण विश्व – साहित्य भी गौरव निधि हैं ।

अगर आपको ये लेख Essay on Premchand in Hindi पसंद आये तो शेयर जरूर करें |

%d bloggers like this: